दिल यूँ ही बेज़ुबाँ नहीं होता
ग़म, ज़ुबाँ से बयाँ नहीं होता
आग जलती है रात दिन दिल में
लेकिन इसका धुआँ नहीं होता
आसान है करना बातें वफ़ा की
पूरा ये सबसे इम्तिहाँ नहीं होता
चाँद सूरज सियाह लगते हैं
ग़म का साया कहाँ नहीं होता
सभी को होती है रौशनी हासिल
बस एक मुक़म्मल जहाँ नहीं होता
अश्क़ों की नगरी में देखा है अक्सर
खुशियों का कारवाँ नहीं होता
तेरी यादों से जब लिपटती है 'मीना'
कोई भी तो दरमियाँ नहीं होता
ग़म, ज़ुबाँ से बयाँ नहीं होता
आग जलती है रात दिन दिल में
लेकिन इसका धुआँ नहीं होता
आसान है करना बातें वफ़ा की
पूरा ये सबसे इम्तिहाँ नहीं होता
चाँद सूरज सियाह लगते हैं
ग़म का साया कहाँ नहीं होता
सभी को होती है रौशनी हासिल
बस एक मुक़म्मल जहाँ नहीं होता
अश्क़ों की नगरी में देखा है अक्सर
खुशियों का कारवाँ नहीं होता
तेरी यादों से जब लिपटती है 'मीना'
कोई भी तो दरमियाँ नहीं होता