Saturday, July 18, 2015

दिल में इक आस सी उभरती है...

दिल में इक आस सी उभरती है
तेरे ही नाम से सँवरती है

कोई बेनींद रात चुपके से
मेरे कन्धों पे लो उतरती है
जैसे इक याद चाँदनी बन कर 
मेरी आँखों से यूँ बिखरती है

खोलो अब आसमाँ कि खिड़की
उस की खुशबू यहाँ गुज़रती है

जैसे तुम आये हो गया ज़ाहिर
मेरी सूरत सुना निखरती है
---मीना---

Thursday, July 16, 2015

दिल के रिश्तों में हिसाब

फासलों का किसने* रक्खा दिल के* रिश्तों में हिसाब 
उनका* मेरे पास घर हो, ये ज़रूरी तो नहीं

ज़माने भर से नहीं...

ज़माने भर से नहीं खुद से है मुख़ातिब 'मीना' 
सुक़ून अपने ही कहीं अन्दर तलाश करना है

हम जागते रहे.…

इस आस पर कि रात न गुज़रे तमाम उम्र
सदियों किसी की याद में हम जागते रहे.…

मेरे अंदर यह कौन है जो मुझसे ख़फ़ा है ?

मेरे अंदर यह कौन है  
जो मुझसे ख़फ़ा है ?
कभी दिल की तहों में 
पड़ा चीखता है 
कभी बहती रगों में 
सरासर दौड़ता है 
कभी आँखों की
शर्म में डूबता है 
कभी कानों में आकर 
चुपके से कहता है.…
तू अब तलक यहाँ है 
इक शहर उदास वहाँ है
एक आग है लगी हुई 
प्यास कहाँ बुझी हुई 
लाखों जंगल काटे हैं 
भयानक सन्नाटे हैं 
खौफ है मचा हुआ
इन्सानियत धुआँ धुआँ
तू अब तलक है जी रहा 
ख़्वाबों के घूँट पी रहा 
तू अब तलक यहाँ है 
इक शहर उदास वहाँ है


मेरे अंदर यह कौन है
जो मुझसे ख़फ़ा है ? 

---मीना, जुलाई २०१५---

Tuesday, July 7, 2015

समुन्दर तालाश करती हूँ...

छुपाऊँ जाके कहाँ अपने आपको 'मीना'
क़तरा हूँ इक समुन्दर तालाश करती हूँ

अब्र तू ही बुझा लगी दिल की...

अब्र तू ही बुझा लगी दिल की 
मैं तो आँखें सुखा के बैठी हूँ 

छूट जाएगा साथ सबसे ही 'मीना'
जिन को अपना बना के बैठी हूँ