Friday, October 30, 2015

कौन है.…

किस के क़दमों के निशाँ हैं हर तरफ फैले हुए 
घर में बैठी हूँ तो बाहर जाता अब ये कौन है 

सुब्ह उठकर तारे चुनती रहती हूँ बिस्तर से मैं 
रात छुपके मेरे घर में आता अब ये कौन है

रात भर भीगी हूँ 'मीना' मैं भी किसकी ओस में आसमाँ से चाँदनी बरसाता अब ये कौन है.…

Monday, October 26, 2015

ये मुलाक़ात...

आना था उसका जैसे कि खुशबू बिखर गई
इतनी सी थी मगर ये मुलाक़ात क्या कहें...

आईना...

है तुझ को भी मुहब्बत, डाल अपनी नज़रों में नज़र
दिल दे देगा गवाही, अपने आगे आईना तो कर.…

क़ुरबत...

आज घबरा के मैं फिर घर से निकल आयी हूँ
आज फिर रास न आयी मुझे क़ुरबत मेरी...


Saturday, October 17, 2015

मिलेगी कब मिरी परछाई उसकी खुशबु से
चिराग हाथ में लेकर हवा कब आएगी...

Monday, October 12, 2015

अभी हम हैं...

जो रिश्ते हैं हकीकत में वो अब रिश्ते न नाते हैं
हमें जो लगते हैं अपने उन्ही से चोट खाते हैं

कभी लोगों के ताने हैं कभी घर की परेशानी
मुसीबत साथ है उसके उसे तनहा ही पाते हैं

नई मंज़िल बनानी है नये रस्ते बसाएँगे
सितम की उम्र छोटी है ज़रा उसको बताते हैं

कि महनत की कलम से ही जो लिखते हैं क़िताबों को
कभी उनके मुक़द्दर के सफे रँग ले ही आते हैं

हमारे ही बनाने से बने हैं ये सभी झगडे
किसी मज़हब की साज़िश में कभी बच्चों को पाते हैं ? 

अभी हम हैं हमारे बाद भी होंगी यही बातें
चलो हम तुम ज़माने में मुहब्बत छोड़ जाते हैं 

Sunday, October 11, 2015

कोई है…

कोई है…
कि जो जागे साथ चराग़ों के कभी नींदें अपनी बरबाद करे
कभी छेड़े बात सितारों की, कभी पूरे चाँद को याद करे....

Sridhar...

मेरा एक अज़ीज़ साथी अब नहीं रहा.…उसने अपनी ज़िन्दगी के चालीस साल एक नया समाज बनाने की जद्दो-जहद में लगा दिये...ये जगह अब खाली है दोस्तों...

मैं भी वही हूँ और मेरा शहर भी वही
लेकिन जो आशना था वो चहरा नहीं रहा

'मीना' बिछड़ के उस से बड़ी मुश्किलों में हूँ
जो जी रहा था मुझ में वो ज़िन्दा नहीं रहा

लगी हूँ जो बुझने

लगी हूँ जो बुझने मैं 'मीना' कभी
जलाया है मौजे-हवा ने मुझे...!!!

सुब्ह...

सुब्ह तारे चुनती हूँ बिस्तर से मैं
रात मेरे घर ये आता कौन है...

कभी-कभी

कभी-कभी
जब तुम आँखों में आ जाते हो
एक याद
घने बादल-सी बरस जाती है ......

तो सुबह हो...


कुछ दिन से मेरे दिल में नई चाह जगी है
सर रख के तेरी गोद में सो लूँ तो सुबह हो

जो बन के हवा बस्ती है तुझ में ही इतर सी
उस खुशबु को साँसों में समो लूँ तो सुबह हो

लफ़्ज़ों में छुपी रहती है हर दिल की कहानी
यह सोच के हर लफ्ज़ को बोलूँ तो सुबह हो

चलना है तो चल वक़्त रुकेगा न कभी भी
हर रिश्ते को माला में पिरो लूँ तो सुबह हो…
दुनिया में मुहब्बत-सा कहीं कुछ भी नहीं है
हर दिल में इसी रंग को घोलूँ तो सुबह हो...!!!

Saturday, October 3, 2015

मालुम न था ...

ज़िन्दगी से ज़िन्दगी के दरमियाँ
रात भी होगी हमें मालुम न था ...