Sunday, May 31, 2015

अब वक़्त का मुड़ना भी गवारा नहीं होगा...

मौसम के बदलते ही बदल जाती हैं आँखें
आ देख कि फिर ऐसा नज़ारा नहीं होगा


ये ख्वाब भी ताबीर के उस मोड़ पे खोये
डूबेंगे जहाँ हम तो सहारा नहीं होगा


देखो ये भटकते हुवे रस्ता मुझे पूछे
मंजिल ने इन्हें यार पुकारा नहीं होगा


इस शहर की खामोशी किसी तर'ह तो टूटे
कोई तो हो जो दर्द का मारा नहीं होगा


ये जीस्त तो 'मीना' है तिलिस्मी के नगर सी
अब वक़्त का मुड़ना भी गवारा नहीं होगा

Friday, May 29, 2015

साथ चलते क़दम अजनबी हो गए
उनसे बिछुड़े तो हम ज़ख़्मी हो गए...
कैसे पाऊँगी मैं 'मीना' उसको
मेरी किस्मत में जो लिखा ही नहीं
रो रहीं है 'मीना' कि ख़ामोशी मुक़द्दर हो गई
लोग खुश हैं कि मेरे शहर में है शोर कम...!!!

हमने पत्तियों-सा बिखर के देखा है

क्या कहूँ क्या था रुख़ हवाओं का
हमने पत्तियों-सा बिखर के देखा है

ज़िन्दगी थम सी जाती हो जैसे
उस से जब भी बिछड़ के देखा है

Tuesday, May 26, 2015

आती हुई हर साँस भी जाने के लिए है.…

तन्हाई का एहसास बढ़ाने के लिए है
आती हुई हर साँस भी जाने के लिए है.…


दुनिया तेरी यादों का बदल हो नहीं सकती
दुनिया तो तेरी याद दिलाने के लिए है.…

एक क़तरा अश्क़ का...

एक क़तरा अश्क़ का पलकों पे कल जो रह गया 
जाने कितनी दास्तानें बिन कहे वो कह गया...

Sunday, May 24, 2015

इक आँसू...

क़तरा-क़तरा दिल में आँसू गिरते हैं...

इक आँसू उस शक़्स का, जो बेगाना है
इक आँसू उस नाम का, जो मैं ले न सकी
इक आँसू उस दुआ का, जो पूरी न हुई
इक आँसू उस चेहरे का जो याद रहा
इक आँसू उस झूट का जो औरों से कहा
बेशुमार आँसू मेरे दामन में खिलते हैं
क़तरा-क़तरा दिल में आँसू गिरते हैं...

Tuesday, May 19, 2015

ग़ज़ल हमको मोहब्बत की सुनाने कौन आएगा...

न होगे तुम तो फिर हमको सताने कौन आएगा
अपनी मीठी मीठी बातों से रिझाने कौन आएगा

तुम्हारे आंसुओं को पोंछने वाले तो हैं लेकिन
जो हम रोये तो समझाने बुझाने कौन आएगा

ख़फ़ा होते हैं हम खुद से मना लेते हैं हम खुद को
हमें मालूम है कि अब हमको मनाने कौन आएगा

ज़माना मतलबी है मतलबों की बात करता है
ग़ज़ल हमको मोहब्बत की सुनाने कौन आएगा

ज़िंदगी की नई राहों को अयां होने दो...

चाँद तारों से कहो आँख मिचौली खेलें
ज़िंदगी की नई राहों को अयां होने दो

अपनी साँसों को कहो धीरे से बिखरें ज़रा
मेरी मासूम निगाही को जवाँ होने दो....

सोचती हूँ ...

सोचती हूँ
कैसे कटेंगे ये दिन
तुम्हारे बिन…
न मैसेजेस की टनटन
न कहकहों की खनखन
दुनिया भर की गप्पें
वो शायरी वो नज़्में
करेगा कौन मुझसे मीठी बातें
कटेंगी कैसे सन्नाटे-सी रातें
सोचती हूँ
रह भी पाउंगी
क्या तुम बिन...

चाँद गुम गया है कहीं ...

आज आसमान में कर्फ्यू है
चाँद गुम गया है कहीं
सूनेपन की स्याही में
तारे भी डूब चुके हैं........

एक अकेली टहनी ...

खामोश राह में दिखी
एक अकेली टहनी
मैंने उसे दो टुकड़े कर
पास-पास रख दिया....

लफ़्ज़ों के अंत तक ...

दोनों ही
दूर कहीं मिल तो लेते हैं
उसकी धरती
मेरा आकाश
लेकिन राहें
कितनी अलग
एक पर वो
दुसरे पर मैं
और बीच में एक लक़ीर
उसकी भी
मेरी भी
हम
कितने एक थे
अपनी रूह में
पर वो चल रहा था
धरती के नीचे शिखरों पे
और मैं
आकाश की ऊँची खाइयों में
शायद
ये राहें मुड़ जाएँ एक दिन
मेरी नज़्म में ही सही
और हम साथ-साथ चल सकें
लफ़्ज़ों के अंत तक

Monday, May 4, 2015

होंटों पर चाहत की बूँदें...

होंटों पर चाहत की बूँदें, भीगा भीगा साँझ सवेरा
तपते मन के सहराओं में जैसे कहीं बरसात हुई...!!!

वक़्त.......

वक़्त के साथ सभी नक़्श भी मिट जाएँगे
वक़्त की रेत पे टिकते नहीं बसेरे यारों 


तुम इन्हें गीत कहो 'मीना' या कि ग़ज़ल
मैंने काग़ज़ पे कुछ आँसू हैं बिखेरे यारों

बने न बने कारवाँ......

चलते हैं मेरे ख्याल सारे
संग बनके परछाइयाँ
फ़र्क़ नहीं पड़ता अब चाहे
बने न बने कारवाँ......