Tuesday, November 17, 2015

कहीं शबनम, कहीं खुशबू, कहीं ताज़ा कली रखना
पुराने पन्नों में तुम खूबसूरत ज़िन्दगी रखना
यहाँ पर आँधियों का आना जाना रोज़ रहता है
ज़रा तुम खुद ही खुद में अब जलाये रौशनी रखना
भरम रह जाएगा देखो कहीं आँसू कहीं ग़म का
सदा चहरे पे तुम अपने बनाये इक हँसी रखना
हैं गहरे ज़ख्म 'मीना' खाये अपनों से, परायों से
कहीं पर आग रख देना, कहीं पर चाँदनी रखना 

Monday, November 16, 2015

सुलगना है ज़रूरी, जल के बुझ जाने से क्या होगा
हमारी है लड़ाई जब, तो परवाने से क्या होगा...
निकल कर बज़्म से देखो कि एक आलम परेशाँ है
यहाँ बैठे हुए ज़ुल्फ़ों को सुलझाने से क्या होगा...
इन हवाओं की खुश्की से ज़ाहिर हुआ
इस शहर की नमी कुछ रूमालों में है...
मैं सदियों पुरानी कहानी हूँ जो
भुला दे तू अब ऐ ज़माने मुझे
रगों में लहू खौलता ही नहीं
ये क्या हो गया अब न जाने मुझे
तो क्या वाक़ई खो गयी हूँ कहीं
मेरा साया निकला है पाने मुझे
लगी नींद जब थपथपाने मुझे
तेरी याद आई जगाने मुझे
हरीफ़ों से कह दो कि तनहा हूँ मैं
चले आएं अब आज़माने मुझे
लगी हूँ जो बुझने मैं 'मीना' कभी
जलाया है मौजे-हवा ने मुझे...!!!
धूप भी खिलती है आज-कल किश्तों में
जलते जितने दिए उतना अँधेरा है.…

सोचती हूँ ...

सोचती हूँ ज़िन्दगी के आखिरी पड़ाव पे मैं खुद को क्या जवाब दूँगी
क्या अब भी ख्वाब सजाती हूँ
बादल के, धूप के, पानी के
क्या अब भी मुहब्बत करती हूँ 
गाती हूँ गीत जवानी के
क्या सुबहो-शाम परिन्दों की
परवाज़ में ध्यान डूबता है
क्या अब्र के परदे हटाते हुए
वो सोच का चाँद झाँकता है
क्या दिल के चमन में बसते हैं
नग़मों की धुन, पायल की खनक
क्या प्यास की शिददतें अब भी वही
आँखों में ले आती हैं लचक
हर लफ्ज़ की रूह से उठती है
बेचैन सदा जो कहती है…
कुछ दिल की सुनाओ ऐ 'मीना'
कहो, सफर तुम्हारा कैसा रहा ?
क्या अब भी ख्वाब सजाती हो ?
क्या अब भी मुहब्बत करती हो ?
वो दिल पे नक़्शे-मुलाक़ात छोड़ जाएगा 
मिला तो हिज्र की सौगात छोड़ जाएगा...

ख़्याल...

मैं अपने आप को तेरे ख्याल में रख कर
तेरे ख़्याल का कितना ख़्याल रखती हूँ...

कश्मकश...

जो कश्मकश से उभरते हैं, उन सितारों को 
अँधेरी रात की चादर छिपा नहीं सकती...

एक छोटा सा घर मैंने छुपा कर रखा है

एक दिन जब जीवन की
आपाधापी कम हो जाएगी
आने वाले कल की
हर पल फ़िक्र
जब ख़त्म हो जाएगी
जिस दिन 'तू' और 'मैं' में बिखरी
अपनी दुनिया 'हम' हो जाएगी
एक ऐसे दिन की उम्मीद
को कायम रखा है
तेरे लिए …
एक छोटा सा घर
मैंने छुपा कर रखा है

इंतज़ार किसका है.…

एक दर्द-ए-मुसलसल से 
हर रोज़ गुज़रती हूँ 
तन्हाई में 
दीवारों से बातें करती हूँ
प्यास इतनी कि 
समन्दर भी पी जाऊँ 
आस ऐसी कि 
हर लम्हा मैं जी जाऊँ
यास की ज़ंजीरों में 
चुप खड़ी हैं उम्मीदें 
हसरतों के साहिल पर 
इंतज़ार किसका है.…