वक़्त-बेवक़्त चला आता है यहाँ सावन
मेरी यादों की गलियां यूँ भी अक्सर भीगी रहती हैं
एक मुद्दत हुई तुम्हे देखे हुए
कभी फुर्सत मिले तो इधर भी आ जाना
ये जो पर्दा है बारिशों का वो भी उठा दूंगी
तुम्हारे रहने के क़ाबिल ये मकान बना दूंगी
देखो बाहर एक आसमान तुम्हे लेने आया है
कभी फुर्सत मिले तो इधर भी आ जाना...
---मीना, अगस्त ३१, २०१४---
मेरी यादों की गलियां यूँ भी अक्सर भीगी रहती हैं
एक मुद्दत हुई तुम्हे देखे हुए
कभी फुर्सत मिले तो इधर भी आ जाना
ये जो पर्दा है बारिशों का वो भी उठा दूंगी
तुम्हारे रहने के क़ाबिल ये मकान बना दूंगी
देखो बाहर एक आसमान तुम्हे लेने आया है
कभी फुर्सत मिले तो इधर भी आ जाना...
---मीना, अगस्त ३१, २०१४---