Friday, October 7, 2016

इन्सान कुर्सियाँ बनाता है
लेकिन कुर्सियाँ....
इन्सान नहीं बनाती हैं...!!!
मिला है वक़्त वस्ल का मेरे करीब आ ज़रा
रहे न दरमियाँ कोई मेरे हबीब आ ज़रा....
तुम
जो अब नहीं हो...
फिर भी
दस्तकें
दरवाज़े के उस पार की
चौंका देती हैं मुझे...
हवाएँ
यादों की
दिल झकझोर देती हैं...
ख़ुशबुएँ
तुम्हारी याद दिलाती हैं...
तुम्हारे बग़ैर मैं
इक सूने-ख़ाली घर सी हूँ
जो तुम
अब
मुझे देखते नहीं
मुझ में रहते नहीं
तो यहाँ
इस घर के दरीचों में
बस सिर्फ़ दर्द रहता है ...
वो तो डाकिया है
उसका काम है पैग़ाम पहुँचाना
मगर भीगी हुई आँखों में
ठहरे हुए ख़्वाब
को किन अलफ़ाज़ में भेजूँ....