Monday, August 24, 2015

दशरथ मांझी के नाम.…

लीजिये दोस्तों हम कुछ शायरों की मिली-जुली पेशकश - दशरथ मांझी के नाम.…

जोश में दरिया भी हो तो रास्ता बन जाएगा
साथ मेरे तुम चलो तो क़ाफ़िला बन जाएगा... (Meenakshii Meena)


चीर दे पर्वत का सीना प्यार कहते हैं इसे
अगली नस्लों के लिए वो नक़्श-ए-पा बन जाएगा... (Iliyas Rahat)


गर इरादे नेक हैं तो हौसले तू कर बुलंद
क़ैद में भी रौशनी का सिलसिला बन जाएगा... (Meenakshii Meena)


हौसला है ताब है दिल में है उड़ने की लगन
कुछ दिनों में देखना वो आसमां बन जायेगा... (Meenakshii Meena)


प्यार की दिलकश निशानी का पता है अब चला
देखते ही देखते ये ताज सा बन जाएगा... (Kunwar Yusuf Balrampuri)


एक नज़र में जहनों -दिल की ले तलाशी तो कभी
हक़ परस्ती का दिलों में मामला बन जाएगा... (Anirudh Sinha)

Sunday, August 23, 2015

इस जुनूँ के दौर में

इस जुनूँ के दौर में ढूँढें सुकूने दिल कहाँ
हर तरफ तूफ़ान ही तूफ़ान है साहिल कहाँ


दे सकें कोई ख़ुशी कोई तो ग़म ही बाँट लें
दौड़ती सी ज़िन्दगी फ़ुरसत हमें हासिल कहाँ


बीच की दीवार उसने कर ली ऊँची और भी
पास रहकर दोस्त मेरे हाल में शामिल कहाँ


ऐसे राही को भला कैसे दिखाएँ रास्ता
मील के पत्थर से जो पूछे कि है मंज़िल कहाँ


सोचती हूँ ले चलूँ मैं साथ अपने कारवाँ
रौशनी दिखलाएगा गुमराह को ग़ाफ़िल कहाँ

Thursday, August 20, 2015

छीन लेता है ...

अमन की सोच के रिश्तों की माला छीन लेता है
कभी मस्ज़िद कभी कोई शिवाला छीन लेता है

जिसे अच्छा नहीं लगता ज़मीं का आसमां होना

वही तो ख़्वाब जो बेबाक़ पाला छीन लेता है
करेगा जो बड़ी बातें ज़माने को दिखाने की
गरीबों के हलक से भी निवाला छीन लेता है

दिलों के प्यार की बातें जिसे लगतीं ज़हर जैसीं
वही साक़ी सभी प्यासों से प्याला छीन लेता है

जिसे अच्छी नहीं लगती घरों में रौशनी 'मीना'
वही जलते चरागों से उजाला छीन लेता है...!!!

फूल रख लेना तुम किताब में...

बात माज़ी की वो जभी सुनाते हैं
अश्क़ आँखों में खूब मुस्कराते हैं
हंस पड़ा है क्यों देख आइना तुम को
राज़ कैसे कैसे सभी छुपाते हैं
बात करते हैं जो सदा मुहब्बत की
ज़ख़्म दिल पर भी तो वही लगाते हैं
नफरतों के ऐसे दयार में हमको
प्यार करने वाले ही बस सुहाते हैं
बाँट लेना गर बाँट ही सको तुम तो
सबके चेहरों पे ग़म हज़ार पाते हैं
फूल रख लेना तुम किताब में 'मीना'
ये ख़िज़ाओं में भी बहार लाते हैं...!!!

Monday, August 10, 2015

धड़कती है ख़ामोशी...

अधखिले चाँद के नीचे
फैला है अँधेरा
धड़कती है ख़ामोशी...

हैराँ हूँ

हैराँ हूँ मैं तो खुद-ब-खुद से यारों
हर लम्हे को इक उम्र तलक देखा है...
एक मुद्दत से उसे देख रही हूँ 'मीना'
लगता है यूँ बस एक झलक देखा है...

याद टिकी है कब से

क्या करूँ बंद भी कर सकती नहीं दरवाज़ा 
घर की चौखट से कोई याद टिकी है कब से

कभी न कभी

कभी न कभी तो चाहता ही है मन
हाँकते रहना ख़ुद को
अनजान खुली सी राहों पर 
नहीं ?

तुम्हारी याद बहती है...

तुमसे मिलने का
इंतज़ार है...

हवा में तुम्हारी याद
बहती है...

काश…

काश…
प्रेम
होता कोई फ्रेम
झट फिट हो लेते
हम-तुम

कभी सोचती हूँ...

कभी सोचती हूँ...
आकाश भी तो
ऊब जाता होगा
धूप और बारिश के
साथ रहते-रहते…
जैसे हम
रह नहीं पाते
रिश्तों के साथ…

अरे ओ ...

अरे ओ 
उसे भी तो महसूस करो 
जो लिखा नहीं गया 
ख़ामोशी में जो कह जाते हैं लफ्ज़ 
एक उम्र भी कम है उनके लिए 
मगर पढ़ो उन्हें, पढ़ सको तो

माँ ...

माँ
अब बहुत कुछ
बदल गया है…
अब नही सुनाई देती 
वो घंटी की टन-टन
जो तुम घँटों बजाती थीं
दीवार पे टंगी तस्वीरों पे
ना ही बजता है फ़ोन
रोज़-रोज़ ये पूछने के लिए
कि मैंने खा लिया है की नहीं
और न ही मिलती है खबर
पास-पडोसी की
सिमट सी गयी है
दुनिया अब माँ
मेरे घर का नौकर भी
मेरी झिड़की नहीं सुनता
तू तो हर बार मेरी डाँट
सुनी-अनसुनी कर देती थी
उस बूढ़े मकान में
मेरे बचपन और
जलेबी-कचोरी के दिन भी
अब नहीं रहे
रह गयीं हैं तो बस
कुछ तसवीरें
फीके हुए से खत
और नुक्कड़ पे
वो साड़ी की दूकान
जिसे तू ललचती
आँखों से देखा करती थीं
माँ
अब बहुत कुछ
बदल गया है…
(शायद मैं बरसों लिख सकती थी …
अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो… अभी तो एहसास जी रहा है)

Saturday, August 8, 2015

इस बार जब आओगे

इस बार जब आओगे
छुपा दूँगी तुम्हारी चप्पल...

जैसा बचपन में किया करते
जब घर से किसी को
जाने नहीं देना चाहते ...

कुछ कहा...

कुछ कहा...
कुछ सुना...
कहा-सुनी हो गयी

धड़कती है ख़ामोशी...

अधखिले चाँद के नीचे
फैला है अँधेरा
धड़कती है ख़ामोशी...