Thursday, March 31, 2016

कहीं शबनम, कहीं खुशबू, कहीं ताज़ा कली रखना
पुराने पन्नों में तुम खूबसूरत ज़िन्दगी रखना
यहाँ पर आँधियों का आना जाना रोज़ रहता है
ज़रा तुम खुद ही खुद में अब जलाये रौशनी रखना
भरम रह जाएगा देखो कहीं आँसू कहीं ग़म का
सदा चहरे पे तुम अपने बनाये इक हँसी रखना
हैं गहरे ज़ख्म 'मीना' खाये अपनों से, परायों से
कहीं पर आग रख देना, कहीं पर चाँदनी रखना
जाने क्यूँ एक अजीब सी उदासी है, सोचती हूँ....
जो कुछ हुआ, हुआ, अबसे किस्सों का अंत भला देना
मूँगफली का अंतिम दाना, फिरसे मत कड़वा देना...
आज़ाद का
आज़ाद होना ही
उसका मज़हब है
वैसे कोई भी
मज़हब आज़ाद नहीं होता …
कई चीज़ें हैं
जो सच लगती हैं
पर सच नहीं होतीं
जैसे शादी और आज़ादी
कई चीज़ें
सच नहीं लगतीं
पर सच होती हैं
जैसे प्यार और मुहब्बत
मेरा पसंदीदा गाना पाकीज़ा फ़िल्म का "आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे.... " सुनते वक़्त ये शेर मेरे ज़हन में खुद-बखुद लिखा गया.......
वो देख के मुझको हैराँ हैं, खुद आईना लेके बैठे हैं
जब मेरा तमाशा देखा था, अब अपना तमाशा देखेंगे...
चहरा उदास, लब पे दुआ और आँख तर 
शायद किसी से मुझको मुहब्बत है इन दिनों...
मैं कब से अपने अंधेरों के साथ ज़िंदा हूँ 
मुझ ही में है मेरी सहर मुझे खबर नहीं ...
दफ्तर की ऊब, घर की उदासी, जहाँ की फ़िक्र 
इक ज़िंदगी ने देखिए क्या-क्या पहन लिया...
मैं और हूँ, सो, मेरी उड़ानें भी और हैं 
मेरे लिए यहाँ पे फ़िज़ा और क्यों नहीं ?
जहाँ जहाँ भी मिले यूँ तो क़हक़हे बिखरे 
मेरी ही रूह ने हर शक़्स चीख़ता पाया ...
कोई और भी है क्या यहाँ मेरे सिवा
या फिर याद तुम्हारी चली आई है …
छिपा है कौन यहाँ ख़ुद को यूँ छिपाने से
नज़र बदलती नहीं आइना बदलने से...
मेरी ग़ज़ल ही बस उसे महसूस कर सकी 
ख़ामोश सा जो दर्द मेरे टूटने में था....
बैठकर देर तलक सुनती रही ख़ामोशी 
इस इरादे से कि इसमें तेरा पैग़ाम न हो
बहुत से रंग घुले हैं आज इन फ़िज़ाओं में 
यहाँ की धूप शर्मीली हवा नशीली है....
गुज़र गयी शोर मचाती रेल 
अकेला चुपचाप स्टेशन खड़ा 
उसे जाता हुआ देखता रहा ...
बिछड़ के तुमसे मैं बर्फ की तरह जम गयी हूँ 
पिघल के तुम तक पहुँच सकूँ इतनी धूप दे दो...
सुनो,
तुम  और मैं  हर वक़्त झगड़ते हैं  
अपने-अपने सच को साबित करने के लिए 
कितना चिल्लाते हैं  
कई कई दिनों तक 
एक दुसरे से रूठ जाते हैं  
और फिर दूसरा मना ले 
इसकी दुआ भी मनाते हैं  

ये सिर्फ तुम से 
सिर्फ एक तुम जिसके साथ मैं बच्ची सी बन जाती हूँ 
मेरी हर बात तुमसे मनवाती हूँ 
मेरी तल्ख बातें भी नज़र अंदाज़ करवाती हूँ 
बेसुरे से गीत  सुनाती हूँ  
और अगर तुम वाह न करो तो मुंह फुलाती हूँ 
ये सिर्फ तुम् से..... 

लेकिन... 
कल जब 
जान बूझकर मैंने कप को नीचे फेंका 
बेसबब ही तुम्हारी शर्ट को जलाया 
बैठे बैठे खुद पे पानी गिराया 

तो तुम 
ख़फ़ा क्यों नहीं हुए 
क्यों बिगड़े नहीं मुझसे 
बात क्या है, क्यों झगड़ नहीं पाये तुम 

सुनो,
टेढ़ी टेढ़ी नज़रों से घूर कर 
जुदा हो जाओ ना 
चंद लम्हों के लिए ही सही  
ख़फ़ा हो जाओ ना

Tuesday, March 22, 2016

अगर पूरे नहीं होंगे तो मर जाएँगे सुनो 
सजे हुए मेरे आँखों में ख्वाब रहने दो...
रात फिर आएगी, फिर ज़हन के किवाड़ों पे 'मीना' 
कोई कागज़ कलम ले मुझे फिर से आवाज़ देगा
ये उल्फत के अफ़साने 'मीना' हैं कितने दिल-चस्प
मिलती तो हैं आँखें मगर कोई बात नहीं होती...!!!
उसके उजालों के लिए हर बार मैंने यूँ
हँसते हुए उस का ही अँधेरा पहन लिया...
चहरे कई , आहें नई , ओढ़े उदासी को
इक ज़िंदगी ने देखिए क्या-क्या पहन लिया...
आओ हम दोनों गले मिलके ख़ुशी से बिछडें
दिल के रिश्तों का अभी ज़िक्र न छेड़ा जाए...
सर्द रात में 
शॉल ओढ़े 
अपने काँधे पर 
सर रखे 
महसूस करती हूँ मैं 
अक्सर तुम्हारी हरारत....
अजीब धुन है कि मंज़िल मुझे तलाश करे 
सो रास्ते से भटक जाना चाहती हूँ मैं....
सोया था मेरे साथ, आग़ोश में मेरे 
साया था महज़ तेरा, मैं मिल नहीं सकी
तुम्हारे हिज्र में मेरा अजब सा हाल होता है 
यहाँ अच्छा नहीं लगता वहाँ अच्छा नहीं लगता...
तुम अपने दिल के कमरे में मुझे क्यूँ क़ैद करते हो 
मुहब्बत में सनम इक तंग जहाँ अच्छा नहीं लगता...
जब किसी ने तुम्हारा नाम लिया 
जाने क्यों मुझको अपनी याद आयी...
एक साल गुज़रता है... एक साल को आना है...
लफ़्ज़ों का एक कारवाँ है
जो साथ में मेरे चलता है
कुछ दुख तेरे कुछ दुख मेरे
कुछ ख़्वाब शिक़स्त पलकों के
कुछ तन्हाई के पल
ज़ख्मी परवाज़ें... टूटे पर
मुस्कान के साये में आँसू
बेनाम सी चाहत के दुखड़े
सब एक गठड़ी में बाँध लिए
और दरिया में बहा दिए
कुछ दुख तेरे कुछ दुख मेरे
काग़ज़ के फ़लक पे उतरे हैं
एहसास के तारों के लश्कर
हर लफ्ज़ की रूह से उठती है
बेचैन सदा जो कहती है...
आ देख! सफर में हैं अब तक
आ मिल! तुझे कुछ कहना है
एक साल गुजरने वाला है
एक साल अभी तक आना है....
सुबह की धूप-सी
उजली
चमकती
याद उसकी
रात के बादलों-सा 
भारी मेरा दिल
कहता है उससे
चुपके-चुपके
कभी
साँझ ढले मिल....
खोजती थी मैं अपने लफ़्ज़ों की खुशबू हवाओं में 
वो समझा आज फिर मैंने उसे माँगा दुआओं में...
सर्दी की धूप
मुहब्बत की आँच
ख़्याल पकने लगे हैं ....
सुनके आहट हवा के पैरों की 'मीना'
लगता है आ रही है ज़िन्दगी फिर से...
नए साल में नयी हवाएँ आप सब के घर संसार को महकायें यही दुआ है...
कहाँ रहते हो 
कहाँ बसते हो 
मुझे नहीं मालूम 
लेकिन ये हवाएँ 
तुम्हारी ख़ुश्बू 
मुझ तक ले आती हैं
ये धुआँ जो है, ये कहाँ का है, वो जो आग थी , कहाँ की थी 
वो जो आईने में झलकता है वो दर्द-ए-बयाँ किस का है....
टूट-टूटकर बिखर गए हम 
शायद इसीलिए निखर गए हम...
तुम कहते हो दो लफ़्ज़ों में बयाँ करें
तन्हाई के बाकी पन्नों का क्या करें....
काफी देर से 
खुद से झूझ रही हूँ मैं
कुछ लिखना चाहती हूँ
पर हाथ ही नहीं उठ रहे
न जाने यह कैसी चुप है
जैसे दिल और दिमाग
दोनों कह रहे हों
पैक अप ....
किसी के चुप रहने का मतलब यह तो नहीं
कि उसके अंदर कोई हलचल नहीं है...
एक-एक होने के पीछे होता है... कितना-कितना न होना...
वक़्त की लहरों पर जब सूरज शाम लिखा करता है 
रेत पे बैठा कोई मेरा नाम लिखा करता है .....
वो जब भी चाहेगा जल उठूँगी
न जाने कब से बुझी हुई हूँ ...
बदल गया तू तो क्या शिक़ायत
मैं भी तो क्या थी मैं क्या हुई हूँ
एक पुरानी ग़ज़ल जिसे बहर में लिखने की कोशिश ...
दिल यूँ ही बेज़ुबाँ नहीं होता
ग़म ज़ुबाँ से बयाँ नहीं होता
आग जलती है रात दिन दिल में
फिर भी इसका धुआँ नहीं होता
अश्क के इस नगर में खुशियों का
दूर तक कारवाँ नहीँ होता
चाँद सूरज सियाह लगते हैं
ग़म का साया कहाँ नहीं होता
सब को होती है रौशनी हासिल
बस मुक़म्मल जहाँ नहीं होता
तेरी यादों से जब लिपटती हूँ
कोइ भी दरमियाँ नहीं होता...
नींद उड़ा देती है जुदाई
वस्ल हमेशा सोता क्यों है ?
सिर्फ़ आँखों से पढ़ नहीं सकते
दर्दे-दिल है कोई किताब नहीं...
रहने दो कल परसों की बातें तुम
प्यार है ये कोई हिसाब नहीं...
ये करम है तेरी निगाहों का
वरना हम इतने लाजवाब नहीं...
लिबास बनाकर
उसका ख़याल पहना है.....
बहुत दिन हुए 
तुम्हे छू कर नहीं देखा
खो कर नहीं देखा
पा कर नहीं देखा
बहुत दिन हुए
कि जी कर नहीं देखा...
दुख की ट्रेन 
धड़धड़ाती हुई आती है...
एहसास का बोझ उठाते उठाते 
लफ़्ज़ कुली बन जाते हैं...
एक चुप से
दूसरी चुप में
बहते संगीत का
सुर
हो तुम...
मैं अपने आप को रख के
ख़्याल में उसके
ये भूल जाऊँ कभी
ख़ुद को रख दिया था कहीं...
हाय रे दिल्ली...
लोग इस शहर के, भजनों की लगाकर कैसेट
सोच लेते हैं कि माहौल बदल जाएगा...!!!
दिल्ली का सर्द गुलाबी मौसम और ऊपर से बारिश ... उफ़्फ़ ...
रात उसकी यादों का बादल 'मीना'
इस क़दर बरसा कि प्यासे हो गए...
था ही क्या मेरे पास 
जिसे छिपाती
और फिर छिपते कहाँ हैं
आँखों से 
ख़्वाब ...
वक़्त की सड़क से
गुज़रते हुए
उम्र के इस मोड़ पर
जब तुम्हें देखा
फिर न वक़्त गुज़रा
न मोड़ मुड़ा
न कोई नया किस्सा
इस सफ़र में जुड़ा...
दे गया बेबसी का लिफ़ाफ़ा मुझे
दर्द भी यार अब डाकिया हो गया...
चेहरों की चोरी करता है
आईना उसपे मरता है...
दिल तुझको ले जायें किधर
हर जानिब सन्नाटा है ...
उदास उदास रास्तों पे शाम की ख़ामोशियाँ 
किसी ने गीत गा दिया तेरा ख़याल आ गया
नई ख़ुशबुएँ हैं नई सुबह महकी
बहकने लगी है नज़र मेरी 'मीना'
वो
यूँ ही आते-जाते हैं
रुकना भी चाहें तो
कैसे, कब तक रुक सकते हैं
मौसम परदेसी होते हैं....
हसीन यादों की चुभती हों सिलवटें जैसे
कि सो रही हूँ मैं, करवट बदल रही है रात...
तुम कहते हो मैं - इक महिला - सिर्फ आज के दिन ख़ास हूँ... बाक़ी के 364 दिनों का क्या होगा?
मेरे वजूद को एक दिन में क़ैद करने की कोशिश न करें
मैं भी इंसान ही हूँ... मेरे अंदर भी वही धड़कन है जो तुम्हारे अंदर धड़कती है, खून का रंग भी वही है, मुझे किसी मज़हब, जाती, योनि, रिश्तों में न बाँधो - मैं किसी एक दिन की खुशियों या दुआओं की मोहताज नहीं... मैं 365 दिन, हर पल मरती हूँ, जीती हूँ, खुशियाँ मनाती हूँ, रोती-बिलखती हूँ, हर वो एहसास में रहती हूँ जिसमे से होकर तुम भी गुज़रते हो... तो चलो - हम इंसानियत का दिन मनाते हैं, रिश्तों को निभाते हैं, हर किसी को गले लगाते हैं, दिलों से वहशत को हटाते हैं, ये तुम और मैं में बटी हुई दुनिया को हमारी दुनिया बनाते हैं, चलो हम तुम ज़माने में मुहब्बत छोड़ जाते हैं...
जाने अनजाने
आती जाती 
साँस
वैसी
तुम्हारी याद....
हर दफ़ा सच को सामने रखना
कोई आसाँ है आइना होना...
आज उँगली कटी याद की डोर से
खींचा फिर से किसी ने तेरी ओर से....
नहीं मालूम कब से मेरे दिल में रहते हैं 'मीना' 
हज़ारों तूफाँ हैं दिल से निकल कर वो कहाँ जायें
मेरे भीतर 
नदी हो, चाहे न हो
सैलाब तो है...!!!

क्या अब मुहब्बत नहीं होती ?

एक अजीब सी उलझन है 
कई दिनों से कोई मजनू नहीं देखा 
राँझा या महिवाल भी नहीं 
क्या अब मुहब्बत नहीं होती ?

वो मेरा अपना चेहरा है....

वो चाहती है कि 
कोई कहीं पे 
दिल लगाए नहीं 
वो चाहती है कि 
ग़म के अँधेरे 
कोई बुझाए नहीं 
वो चाहती है कि 
नदी किनारे 
कोई गीत गाये नहीं....  

मैं चाहती हूँ कि 
दिलों को कोई रोके नहीं 
इश्क़ की पींगें बढ़ाने से 
मैं चाहती हूँ कि 
जुगनू को कोई रोके नहीं 
दिया जलाने से 
मैं चाहती हूँ कि 
कोयल को कोई रोके नहीं 
ग़ज़ल सुनाने से....  

हमारी सूरतें दो हैं मगर 
हैं एक ही हम 
उस आईने में जो 
दोनों की एक दुनिया है 
मैं उसका अक्स हूँ 
वो मेरा अपना चेहरा है....