Sunday, February 22, 2015

हम बेखुदी में तुझ ही से प्यार करते रहे....

वो दिन जब कोई वजहे- इंतज़ार न थी
हम उनमें भी तेरा इंतज़ार करते रहे
रंग बदले किसी सूरत इस तन्हाई का
हम खिज़ा में भी तलाश बहार करते रहे

सुन तो ले, देख तो ले, मान भी ले 'मीना'
हम बेखुदी में तुझ ही से प्यार करते रहे....

Thursday, February 12, 2015

क्या डराती हैं हवाएँ मुझे अंजाम से...

मैं तो मिट्टी का बदन ओढ़ के खुद निकली हूँ
क्या डराती हैं हवाएँ मुझे अंजाम से...!!!


अपने चेहरे पे न औरों के ख़्याल सजा 'मीना'
रूप आता है कहीं किसी के दिए नाम से...!!!

और यूँ हर शाम की होती है मुश्क़िल से सहर ...

गूँजती हैं मन के वीराने में क्या क्या आहटें
और यूँ हर शाम की होती है मुश्क़िल से सहर

उदास रात के आँगन में रात की रानी
महक उठती है तुझे सोचकर यूँही अक़्सर

कल भी बुझ जाते थे,  जल उठते थे यादों के दिए
आज तो जी की लगी करने नहीं देती है सबर

कि एक रेल की सीटी ख़ामोश मद्धम सी
सुना जाती है कि लम्बा है सितारों का सफर

दिल अपना खोल के 'मीना' रखें किस के आगे
यहाँ कोई दोस्त न हमदम न है कोई हमसफ़र

Monday, February 9, 2015

तसवीरें कहाँ बोलती हैं ....

तसवीरें कहाँ बोलती हैं 
बस मेज़ के किसी कोने पे 
बैठी गुज़रे ज़माने  के राज़ खोलती हैं 
बहुत कोशिश की है  
मैंने इनसे बात करने की 
पर ये वक़्त की क़ैद में लिपटी 
किसी के न होने का एहसास ज़िंदा करा जाती हैं 
तसवीरें कहाँ कुछ बोलती हैं  

Saturday, February 7, 2015

समझें किसे अपना, है पराया कौन

समझें किसे अपना, है पराया कौन
चेहरे पे कई चेहरे लगाए हुए हैं लोग


बढ़ा तो लें हाथ दोस्ती के मगर 'मीना'
हाथों से अपने ज़ख्म दबाए हुए हैं लोग

Friday, February 6, 2015

यादें लफ़्ज़ों में उतरती रहीं...

हसीं खामोशियों के सायों में
वस्ल की रातें ढलती रहीं...

सूने सफ़ेद कागज़ों पे रह रह कर
यादें लफ़्ज़ों में उतरती रहीं...

Monday, February 2, 2015

तुम पास में हो, पर है, इक फ़ासिला बकाया

तुम कब मिलोगे मुझको कब दूरियाँ घटेंगी 
तुम पास में हो, पर है, इक फ़ासिला बकाया 

इस तरह से न करना बातों को ख़त्म अपनी 
रह जाने भी दो 'मीना' इक सिलसिला बक़ाया