Tuesday, November 17, 2015

कहीं शबनम, कहीं खुशबू, कहीं ताज़ा कली रखना
पुराने पन्नों में तुम खूबसूरत ज़िन्दगी रखना
यहाँ पर आँधियों का आना जाना रोज़ रहता है
ज़रा तुम खुद ही खुद में अब जलाये रौशनी रखना
भरम रह जाएगा देखो कहीं आँसू कहीं ग़म का
सदा चहरे पे तुम अपने बनाये इक हँसी रखना
हैं गहरे ज़ख्म 'मीना' खाये अपनों से, परायों से
कहीं पर आग रख देना, कहीं पर चाँदनी रखना 

Monday, November 16, 2015

सुलगना है ज़रूरी, जल के बुझ जाने से क्या होगा
हमारी है लड़ाई जब, तो परवाने से क्या होगा...
निकल कर बज़्म से देखो कि एक आलम परेशाँ है
यहाँ बैठे हुए ज़ुल्फ़ों को सुलझाने से क्या होगा...
इन हवाओं की खुश्की से ज़ाहिर हुआ
इस शहर की नमी कुछ रूमालों में है...
मैं सदियों पुरानी कहानी हूँ जो
भुला दे तू अब ऐ ज़माने मुझे
रगों में लहू खौलता ही नहीं
ये क्या हो गया अब न जाने मुझे
तो क्या वाक़ई खो गयी हूँ कहीं
मेरा साया निकला है पाने मुझे
लगी नींद जब थपथपाने मुझे
तेरी याद आई जगाने मुझे
हरीफ़ों से कह दो कि तनहा हूँ मैं
चले आएं अब आज़माने मुझे
लगी हूँ जो बुझने मैं 'मीना' कभी
जलाया है मौजे-हवा ने मुझे...!!!
धूप भी खिलती है आज-कल किश्तों में
जलते जितने दिए उतना अँधेरा है.…

सोचती हूँ ...

सोचती हूँ ज़िन्दगी के आखिरी पड़ाव पे मैं खुद को क्या जवाब दूँगी
क्या अब भी ख्वाब सजाती हूँ
बादल के, धूप के, पानी के
क्या अब भी मुहब्बत करती हूँ 
गाती हूँ गीत जवानी के
क्या सुबहो-शाम परिन्दों की
परवाज़ में ध्यान डूबता है
क्या अब्र के परदे हटाते हुए
वो सोच का चाँद झाँकता है
क्या दिल के चमन में बसते हैं
नग़मों की धुन, पायल की खनक
क्या प्यास की शिददतें अब भी वही
आँखों में ले आती हैं लचक
हर लफ्ज़ की रूह से उठती है
बेचैन सदा जो कहती है…
कुछ दिल की सुनाओ ऐ 'मीना'
कहो, सफर तुम्हारा कैसा रहा ?
क्या अब भी ख्वाब सजाती हो ?
क्या अब भी मुहब्बत करती हो ?
वो दिल पे नक़्शे-मुलाक़ात छोड़ जाएगा 
मिला तो हिज्र की सौगात छोड़ जाएगा...

ख़्याल...

मैं अपने आप को तेरे ख्याल में रख कर
तेरे ख़्याल का कितना ख़्याल रखती हूँ...

कश्मकश...

जो कश्मकश से उभरते हैं, उन सितारों को 
अँधेरी रात की चादर छिपा नहीं सकती...

एक छोटा सा घर मैंने छुपा कर रखा है

एक दिन जब जीवन की
आपाधापी कम हो जाएगी
आने वाले कल की
हर पल फ़िक्र
जब ख़त्म हो जाएगी
जिस दिन 'तू' और 'मैं' में बिखरी
अपनी दुनिया 'हम' हो जाएगी
एक ऐसे दिन की उम्मीद
को कायम रखा है
तेरे लिए …
एक छोटा सा घर
मैंने छुपा कर रखा है

इंतज़ार किसका है.…

एक दर्द-ए-मुसलसल से 
हर रोज़ गुज़रती हूँ 
तन्हाई में 
दीवारों से बातें करती हूँ
प्यास इतनी कि 
समन्दर भी पी जाऊँ 
आस ऐसी कि 
हर लम्हा मैं जी जाऊँ
यास की ज़ंजीरों में 
चुप खड़ी हैं उम्मीदें 
हसरतों के साहिल पर 
इंतज़ार किसका है.… 


Friday, October 30, 2015

कौन है.…

किस के क़दमों के निशाँ हैं हर तरफ फैले हुए 
घर में बैठी हूँ तो बाहर जाता अब ये कौन है 

सुब्ह उठकर तारे चुनती रहती हूँ बिस्तर से मैं 
रात छुपके मेरे घर में आता अब ये कौन है

रात भर भीगी हूँ 'मीना' मैं भी किसकी ओस में आसमाँ से चाँदनी बरसाता अब ये कौन है.…

Monday, October 26, 2015

ये मुलाक़ात...

आना था उसका जैसे कि खुशबू बिखर गई
इतनी सी थी मगर ये मुलाक़ात क्या कहें...

आईना...

है तुझ को भी मुहब्बत, डाल अपनी नज़रों में नज़र
दिल दे देगा गवाही, अपने आगे आईना तो कर.…

क़ुरबत...

आज घबरा के मैं फिर घर से निकल आयी हूँ
आज फिर रास न आयी मुझे क़ुरबत मेरी...


Saturday, October 17, 2015

मिलेगी कब मिरी परछाई उसकी खुशबु से
चिराग हाथ में लेकर हवा कब आएगी...

Monday, October 12, 2015

अभी हम हैं...

जो रिश्ते हैं हकीकत में वो अब रिश्ते न नाते हैं
हमें जो लगते हैं अपने उन्ही से चोट खाते हैं

कभी लोगों के ताने हैं कभी घर की परेशानी
मुसीबत साथ है उसके उसे तनहा ही पाते हैं

नई मंज़िल बनानी है नये रस्ते बसाएँगे
सितम की उम्र छोटी है ज़रा उसको बताते हैं

कि महनत की कलम से ही जो लिखते हैं क़िताबों को
कभी उनके मुक़द्दर के सफे रँग ले ही आते हैं

हमारे ही बनाने से बने हैं ये सभी झगडे
किसी मज़हब की साज़िश में कभी बच्चों को पाते हैं ? 

अभी हम हैं हमारे बाद भी होंगी यही बातें
चलो हम तुम ज़माने में मुहब्बत छोड़ जाते हैं 

Sunday, October 11, 2015

कोई है…

कोई है…
कि जो जागे साथ चराग़ों के कभी नींदें अपनी बरबाद करे
कभी छेड़े बात सितारों की, कभी पूरे चाँद को याद करे....

Sridhar...

मेरा एक अज़ीज़ साथी अब नहीं रहा.…उसने अपनी ज़िन्दगी के चालीस साल एक नया समाज बनाने की जद्दो-जहद में लगा दिये...ये जगह अब खाली है दोस्तों...

मैं भी वही हूँ और मेरा शहर भी वही
लेकिन जो आशना था वो चहरा नहीं रहा

'मीना' बिछड़ के उस से बड़ी मुश्किलों में हूँ
जो जी रहा था मुझ में वो ज़िन्दा नहीं रहा

लगी हूँ जो बुझने

लगी हूँ जो बुझने मैं 'मीना' कभी
जलाया है मौजे-हवा ने मुझे...!!!

सुब्ह...

सुब्ह तारे चुनती हूँ बिस्तर से मैं
रात मेरे घर ये आता कौन है...

कभी-कभी

कभी-कभी
जब तुम आँखों में आ जाते हो
एक याद
घने बादल-सी बरस जाती है ......

तो सुबह हो...


कुछ दिन से मेरे दिल में नई चाह जगी है
सर रख के तेरी गोद में सो लूँ तो सुबह हो

जो बन के हवा बस्ती है तुझ में ही इतर सी
उस खुशबु को साँसों में समो लूँ तो सुबह हो

लफ़्ज़ों में छुपी रहती है हर दिल की कहानी
यह सोच के हर लफ्ज़ को बोलूँ तो सुबह हो

चलना है तो चल वक़्त रुकेगा न कभी भी
हर रिश्ते को माला में पिरो लूँ तो सुबह हो…
दुनिया में मुहब्बत-सा कहीं कुछ भी नहीं है
हर दिल में इसी रंग को घोलूँ तो सुबह हो...!!!

Saturday, October 3, 2015

मालुम न था ...

ज़िन्दगी से ज़िन्दगी के दरमियाँ
रात भी होगी हमें मालुम न था ...

Tuesday, September 29, 2015

तू भीग ले...

बादल उठे हैं यहाँ बारिश लगी है आज फिर
तू भीग ले संग मेरे आ कर ज़रा ऐ ज़िन्दगी

फिर छेड़ दिया किसने एहसास के तारों को...

छुपने लगी है मुझसे क्या बात मेरे दिल में
इक दर्द-सा उठता है हर रात मेरे दिल में

एहसास की गर्मी से तपता है बदन मेरा
शायद अभी बाक़ी हैं जज़्बात मेरे दिल में

हर शाम उमड़ते हैं यादों के घने बादल
हर रात सुलगती है बरसात मेरे दिल में

फिर छेड़ दिया किसने एहसास के तारों को
फिर दर्द के उठते हैं नग़मात मेरे दिल में

छा जाती है रातों में जब शहर पे ख़ामोशी
तब जागते हैं कितने लम्हात मेरे दिल में

Wednesday, September 23, 2015

सिलसिला-ऐ-अश्क़ हूँ

सिलसिला-ऐ-अश्क़ हूँ बह कर बयाँ हो जाऊँगी
देखते ही देखते मैं दास्ताँ हो जाऊँगी

ये सही है मैं बहुत तनहा रही हूँ उम्र भर
एक दिन तुम देखना मैं कारवाँ हो जाऊँगी
कर सितम जितना मगर ये जान ले बेहरूपीए
वक़्त आएगा कि मैं सच की ज़ुबाँ हो जाऊँगी

जानती हूँ बोलने पे है कड़ी पहरेदारी 
चुप्पियाँ पाले रही जल कर धुआँ हो जाऊँगी

जिन दिलों में हौसला हो आसमाँ छूने का अब
उन परों के वास्ते मैं आशियाँ हो जाऊँगी

Monday, August 24, 2015

दशरथ मांझी के नाम.…

लीजिये दोस्तों हम कुछ शायरों की मिली-जुली पेशकश - दशरथ मांझी के नाम.…

जोश में दरिया भी हो तो रास्ता बन जाएगा
साथ मेरे तुम चलो तो क़ाफ़िला बन जाएगा... (Meenakshii Meena)


चीर दे पर्वत का सीना प्यार कहते हैं इसे
अगली नस्लों के लिए वो नक़्श-ए-पा बन जाएगा... (Iliyas Rahat)


गर इरादे नेक हैं तो हौसले तू कर बुलंद
क़ैद में भी रौशनी का सिलसिला बन जाएगा... (Meenakshii Meena)


हौसला है ताब है दिल में है उड़ने की लगन
कुछ दिनों में देखना वो आसमां बन जायेगा... (Meenakshii Meena)


प्यार की दिलकश निशानी का पता है अब चला
देखते ही देखते ये ताज सा बन जाएगा... (Kunwar Yusuf Balrampuri)


एक नज़र में जहनों -दिल की ले तलाशी तो कभी
हक़ परस्ती का दिलों में मामला बन जाएगा... (Anirudh Sinha)

Sunday, August 23, 2015

इस जुनूँ के दौर में

इस जुनूँ के दौर में ढूँढें सुकूने दिल कहाँ
हर तरफ तूफ़ान ही तूफ़ान है साहिल कहाँ


दे सकें कोई ख़ुशी कोई तो ग़म ही बाँट लें
दौड़ती सी ज़िन्दगी फ़ुरसत हमें हासिल कहाँ


बीच की दीवार उसने कर ली ऊँची और भी
पास रहकर दोस्त मेरे हाल में शामिल कहाँ


ऐसे राही को भला कैसे दिखाएँ रास्ता
मील के पत्थर से जो पूछे कि है मंज़िल कहाँ


सोचती हूँ ले चलूँ मैं साथ अपने कारवाँ
रौशनी दिखलाएगा गुमराह को ग़ाफ़िल कहाँ

Thursday, August 20, 2015

छीन लेता है ...

अमन की सोच के रिश्तों की माला छीन लेता है
कभी मस्ज़िद कभी कोई शिवाला छीन लेता है

जिसे अच्छा नहीं लगता ज़मीं का आसमां होना

वही तो ख़्वाब जो बेबाक़ पाला छीन लेता है
करेगा जो बड़ी बातें ज़माने को दिखाने की
गरीबों के हलक से भी निवाला छीन लेता है

दिलों के प्यार की बातें जिसे लगतीं ज़हर जैसीं
वही साक़ी सभी प्यासों से प्याला छीन लेता है

जिसे अच्छी नहीं लगती घरों में रौशनी 'मीना'
वही जलते चरागों से उजाला छीन लेता है...!!!

फूल रख लेना तुम किताब में...

बात माज़ी की वो जभी सुनाते हैं
अश्क़ आँखों में खूब मुस्कराते हैं
हंस पड़ा है क्यों देख आइना तुम को
राज़ कैसे कैसे सभी छुपाते हैं
बात करते हैं जो सदा मुहब्बत की
ज़ख़्म दिल पर भी तो वही लगाते हैं
नफरतों के ऐसे दयार में हमको
प्यार करने वाले ही बस सुहाते हैं
बाँट लेना गर बाँट ही सको तुम तो
सबके चेहरों पे ग़म हज़ार पाते हैं
फूल रख लेना तुम किताब में 'मीना'
ये ख़िज़ाओं में भी बहार लाते हैं...!!!

Monday, August 10, 2015

धड़कती है ख़ामोशी...

अधखिले चाँद के नीचे
फैला है अँधेरा
धड़कती है ख़ामोशी...

हैराँ हूँ

हैराँ हूँ मैं तो खुद-ब-खुद से यारों
हर लम्हे को इक उम्र तलक देखा है...
एक मुद्दत से उसे देख रही हूँ 'मीना'
लगता है यूँ बस एक झलक देखा है...

याद टिकी है कब से

क्या करूँ बंद भी कर सकती नहीं दरवाज़ा 
घर की चौखट से कोई याद टिकी है कब से

कभी न कभी

कभी न कभी तो चाहता ही है मन
हाँकते रहना ख़ुद को
अनजान खुली सी राहों पर 
नहीं ?

तुम्हारी याद बहती है...

तुमसे मिलने का
इंतज़ार है...

हवा में तुम्हारी याद
बहती है...

काश…

काश…
प्रेम
होता कोई फ्रेम
झट फिट हो लेते
हम-तुम

कभी सोचती हूँ...

कभी सोचती हूँ...
आकाश भी तो
ऊब जाता होगा
धूप और बारिश के
साथ रहते-रहते…
जैसे हम
रह नहीं पाते
रिश्तों के साथ…

अरे ओ ...

अरे ओ 
उसे भी तो महसूस करो 
जो लिखा नहीं गया 
ख़ामोशी में जो कह जाते हैं लफ्ज़ 
एक उम्र भी कम है उनके लिए 
मगर पढ़ो उन्हें, पढ़ सको तो

माँ ...

माँ
अब बहुत कुछ
बदल गया है…
अब नही सुनाई देती 
वो घंटी की टन-टन
जो तुम घँटों बजाती थीं
दीवार पे टंगी तस्वीरों पे
ना ही बजता है फ़ोन
रोज़-रोज़ ये पूछने के लिए
कि मैंने खा लिया है की नहीं
और न ही मिलती है खबर
पास-पडोसी की
सिमट सी गयी है
दुनिया अब माँ
मेरे घर का नौकर भी
मेरी झिड़की नहीं सुनता
तू तो हर बार मेरी डाँट
सुनी-अनसुनी कर देती थी
उस बूढ़े मकान में
मेरे बचपन और
जलेबी-कचोरी के दिन भी
अब नहीं रहे
रह गयीं हैं तो बस
कुछ तसवीरें
फीके हुए से खत
और नुक्कड़ पे
वो साड़ी की दूकान
जिसे तू ललचती
आँखों से देखा करती थीं
माँ
अब बहुत कुछ
बदल गया है…
(शायद मैं बरसों लिख सकती थी …
अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो… अभी तो एहसास जी रहा है)

Saturday, August 8, 2015

इस बार जब आओगे

इस बार जब आओगे
छुपा दूँगी तुम्हारी चप्पल...

जैसा बचपन में किया करते
जब घर से किसी को
जाने नहीं देना चाहते ...

कुछ कहा...

कुछ कहा...
कुछ सुना...
कहा-सुनी हो गयी

धड़कती है ख़ामोशी...

अधखिले चाँद के नीचे
फैला है अँधेरा
धड़कती है ख़ामोशी...

Saturday, July 18, 2015

दिल में इक आस सी उभरती है...

दिल में इक आस सी उभरती है
तेरे ही नाम से सँवरती है

कोई बेनींद रात चुपके से
मेरे कन्धों पे लो उतरती है
जैसे इक याद चाँदनी बन कर 
मेरी आँखों से यूँ बिखरती है

खोलो अब आसमाँ कि खिड़की
उस की खुशबू यहाँ गुज़रती है

जैसे तुम आये हो गया ज़ाहिर
मेरी सूरत सुना निखरती है
---मीना---

Thursday, July 16, 2015

दिल के रिश्तों में हिसाब

फासलों का किसने* रक्खा दिल के* रिश्तों में हिसाब 
उनका* मेरे पास घर हो, ये ज़रूरी तो नहीं

ज़माने भर से नहीं...

ज़माने भर से नहीं खुद से है मुख़ातिब 'मीना' 
सुक़ून अपने ही कहीं अन्दर तलाश करना है

हम जागते रहे.…

इस आस पर कि रात न गुज़रे तमाम उम्र
सदियों किसी की याद में हम जागते रहे.…

मेरे अंदर यह कौन है जो मुझसे ख़फ़ा है ?

मेरे अंदर यह कौन है  
जो मुझसे ख़फ़ा है ?
कभी दिल की तहों में 
पड़ा चीखता है 
कभी बहती रगों में 
सरासर दौड़ता है 
कभी आँखों की
शर्म में डूबता है 
कभी कानों में आकर 
चुपके से कहता है.…
तू अब तलक यहाँ है 
इक शहर उदास वहाँ है
एक आग है लगी हुई 
प्यास कहाँ बुझी हुई 
लाखों जंगल काटे हैं 
भयानक सन्नाटे हैं 
खौफ है मचा हुआ
इन्सानियत धुआँ धुआँ
तू अब तलक है जी रहा 
ख़्वाबों के घूँट पी रहा 
तू अब तलक यहाँ है 
इक शहर उदास वहाँ है


मेरे अंदर यह कौन है
जो मुझसे ख़फ़ा है ? 

---मीना, जुलाई २०१५---

Tuesday, July 7, 2015

समुन्दर तालाश करती हूँ...

छुपाऊँ जाके कहाँ अपने आपको 'मीना'
क़तरा हूँ इक समुन्दर तालाश करती हूँ

अब्र तू ही बुझा लगी दिल की...

अब्र तू ही बुझा लगी दिल की 
मैं तो आँखें सुखा के बैठी हूँ 

छूट जाएगा साथ सबसे ही 'मीना'
जिन को अपना बना के बैठी हूँ 

Monday, June 29, 2015

यूँ हमारे दरमियाँ

यूँ हमारे दरमियाँ तो फासला 'मीना' ना था
एक शहर था ख्वाब का जो बस्ते-बस्ते रह गया...!!!

बस एक ही गुज़ारिश है

बस एक ही गुज़ारिश है कि ज़रा वक़्त ठहर जाए
बहुत रौनक है उनके आने से शहर में 'मीना' …!!!

देहलीज़ पे जा बैठी है मेरी ख्वाइश…

पलकों पे मुस्कान झुकी-झुकी सी
कुछ कहने को बेचैन लेकिन चुप
दांतों में उमंग का आँचल दबाये
देहलीज़ पे जा बैठी है मेरी ख्वाइश…

कई लम्हे

कई लम्हे
बरसात की बूँदें हैं
जो पकडे नहीं जा सकते
दिल पर आकर लगते हैं
और हाथ बढ़ा
कि इससे पहले
फिसल कर टूट जाते हैं

यूँ लगता है

अभी गया है कोई मगर यूँ लगता है
जैसे सदियाँ बीतीं घर ख़ामोश हुए...

वो आँखें करती थीं मुझसे अनकही बातें

वो आँखें करती थीं मुझसे अनकही बातें 
उनके लिए फिर से सँवरना पड़ा मुझे
फिर ज़िन्दगी ने देख पुकारा है दूर सेइक और रात खुद में ठहरना पड़ा मुझे
---मीना---

Wednesday, June 17, 2015

हमने आँखों में बरसता हुआ सावन देखा...

किसकी यादों की घटा टूट के बरसी दिल पे 
हमने आँखों में बरसता हुआ सावन देखा.... 

मुझे जाने की इज़ाज़त दे दो...

मुझे जाने की इज़ाज़त दे दो
अश्क़ों को मुझे तुम पीने दो 
 
अपने दिल से यूँ विदा करो 
तुम मुझको खुद से रिहा करो
आँखों के आँसू सब देखें 
कोई दिल की दरारें देखे न 
ख़ामोशी के लब सीने दो 
और गुमनामी में बहने दो
यादें हमारी तुम अता करो
तुम मुझको खुद से रिहा करो
कोई झूट ही आकर कह देता 
ये दर्द हमारे सब झूठे हैं 
इन तल्ख़ समाजों को रहने दो
गहरे ज़ख्मों को सहने दो
हमें चैन मिले ये दुआ करो
तुम मुझको खुद से रिहा करो
----मीना----

Sunday, June 7, 2015

बुझ गयी जो लौ...

मैं तो सो लुंगी अंधेरों में मगर 'मीना'
बुझ गयी जो लौ तो देवता मर जाएंगे...!!!

फिर इसके बाद जो बचता है वो कहानी है.....

मैं और मेरी तरह तू भी इक हकीकत है
फिर इसके बाद जो बचता है वो कहानी है.....
---मीना---

मुंबई में बारिश की पहली बूँदें...

ये कमरे का मंद उजाला बाहर हूक पपीहे की
खिड़की पे बूंदों की दस्तक साँसें भरती ख़ामोशी...


--मीना-- (मुंबई में बारिश की पहली बूँदें, ०७ जून २०१५)

Wednesday, June 3, 2015

ये किन हदों से होकर गुज़रना पड़ा मुझे...

ये किन हदों से होके गुज़रना पड़ा मुझे
खुद को समेटने में बिखरना पड़ा मुझे


तुझ में हो गयी थी मैं इस क़दर शामिल
तेरे लिए ही तुझसे बिछड़ना पड़ा मुझे

होते हैं कहाँ पूरे ख़्वाबों के सिलसिले
हर इक मोड़ पे हर बार ठहरना पड़ा मुझे


शादाब होने लगते हैं जब आती है बहार
ज़ख्मों भरी बहार से डरना पड़ा मुझे


ज़रूरी नहीं कि तू हो तो हो ज़िन्दगी
तेरे बिना भी 'मीना' चलना पड़ा मुझे ......

Sunday, May 31, 2015

अब वक़्त का मुड़ना भी गवारा नहीं होगा...

मौसम के बदलते ही बदल जाती हैं आँखें
आ देख कि फिर ऐसा नज़ारा नहीं होगा


ये ख्वाब भी ताबीर के उस मोड़ पे खोये
डूबेंगे जहाँ हम तो सहारा नहीं होगा


देखो ये भटकते हुवे रस्ता मुझे पूछे
मंजिल ने इन्हें यार पुकारा नहीं होगा


इस शहर की खामोशी किसी तर'ह तो टूटे
कोई तो हो जो दर्द का मारा नहीं होगा


ये जीस्त तो 'मीना' है तिलिस्मी के नगर सी
अब वक़्त का मुड़ना भी गवारा नहीं होगा

Friday, May 29, 2015

साथ चलते क़दम अजनबी हो गए
उनसे बिछुड़े तो हम ज़ख़्मी हो गए...
कैसे पाऊँगी मैं 'मीना' उसको
मेरी किस्मत में जो लिखा ही नहीं
रो रहीं है 'मीना' कि ख़ामोशी मुक़द्दर हो गई
लोग खुश हैं कि मेरे शहर में है शोर कम...!!!

हमने पत्तियों-सा बिखर के देखा है

क्या कहूँ क्या था रुख़ हवाओं का
हमने पत्तियों-सा बिखर के देखा है

ज़िन्दगी थम सी जाती हो जैसे
उस से जब भी बिछड़ के देखा है

Tuesday, May 26, 2015

आती हुई हर साँस भी जाने के लिए है.…

तन्हाई का एहसास बढ़ाने के लिए है
आती हुई हर साँस भी जाने के लिए है.…


दुनिया तेरी यादों का बदल हो नहीं सकती
दुनिया तो तेरी याद दिलाने के लिए है.…

एक क़तरा अश्क़ का...

एक क़तरा अश्क़ का पलकों पे कल जो रह गया 
जाने कितनी दास्तानें बिन कहे वो कह गया...

Sunday, May 24, 2015

इक आँसू...

क़तरा-क़तरा दिल में आँसू गिरते हैं...

इक आँसू उस शक़्स का, जो बेगाना है
इक आँसू उस नाम का, जो मैं ले न सकी
इक आँसू उस दुआ का, जो पूरी न हुई
इक आँसू उस चेहरे का जो याद रहा
इक आँसू उस झूट का जो औरों से कहा
बेशुमार आँसू मेरे दामन में खिलते हैं
क़तरा-क़तरा दिल में आँसू गिरते हैं...

Tuesday, May 19, 2015

ग़ज़ल हमको मोहब्बत की सुनाने कौन आएगा...

न होगे तुम तो फिर हमको सताने कौन आएगा
अपनी मीठी मीठी बातों से रिझाने कौन आएगा

तुम्हारे आंसुओं को पोंछने वाले तो हैं लेकिन
जो हम रोये तो समझाने बुझाने कौन आएगा

ख़फ़ा होते हैं हम खुद से मना लेते हैं हम खुद को
हमें मालूम है कि अब हमको मनाने कौन आएगा

ज़माना मतलबी है मतलबों की बात करता है
ग़ज़ल हमको मोहब्बत की सुनाने कौन आएगा

ज़िंदगी की नई राहों को अयां होने दो...

चाँद तारों से कहो आँख मिचौली खेलें
ज़िंदगी की नई राहों को अयां होने दो

अपनी साँसों को कहो धीरे से बिखरें ज़रा
मेरी मासूम निगाही को जवाँ होने दो....

सोचती हूँ ...

सोचती हूँ
कैसे कटेंगे ये दिन
तुम्हारे बिन…
न मैसेजेस की टनटन
न कहकहों की खनखन
दुनिया भर की गप्पें
वो शायरी वो नज़्में
करेगा कौन मुझसे मीठी बातें
कटेंगी कैसे सन्नाटे-सी रातें
सोचती हूँ
रह भी पाउंगी
क्या तुम बिन...

चाँद गुम गया है कहीं ...

आज आसमान में कर्फ्यू है
चाँद गुम गया है कहीं
सूनेपन की स्याही में
तारे भी डूब चुके हैं........

एक अकेली टहनी ...

खामोश राह में दिखी
एक अकेली टहनी
मैंने उसे दो टुकड़े कर
पास-पास रख दिया....

लफ़्ज़ों के अंत तक ...

दोनों ही
दूर कहीं मिल तो लेते हैं
उसकी धरती
मेरा आकाश
लेकिन राहें
कितनी अलग
एक पर वो
दुसरे पर मैं
और बीच में एक लक़ीर
उसकी भी
मेरी भी
हम
कितने एक थे
अपनी रूह में
पर वो चल रहा था
धरती के नीचे शिखरों पे
और मैं
आकाश की ऊँची खाइयों में
शायद
ये राहें मुड़ जाएँ एक दिन
मेरी नज़्म में ही सही
और हम साथ-साथ चल सकें
लफ़्ज़ों के अंत तक

Monday, May 4, 2015

होंटों पर चाहत की बूँदें...

होंटों पर चाहत की बूँदें, भीगा भीगा साँझ सवेरा
तपते मन के सहराओं में जैसे कहीं बरसात हुई...!!!

वक़्त.......

वक़्त के साथ सभी नक़्श भी मिट जाएँगे
वक़्त की रेत पे टिकते नहीं बसेरे यारों 


तुम इन्हें गीत कहो 'मीना' या कि ग़ज़ल
मैंने काग़ज़ पे कुछ आँसू हैं बिखेरे यारों

बने न बने कारवाँ......

चलते हैं मेरे ख्याल सारे
संग बनके परछाइयाँ
फ़र्क़ नहीं पड़ता अब चाहे
बने न बने कारवाँ......

Sunday, March 22, 2015

तुम जहां भी रहो हमारे हो.…

इक नए देस को सिधारे हो
तुम जहां भी रहो हमारे हो.… 


मैं कली के लिबास में आऊँगी
इत्र बन कर फ़िज़ा में छाऊँगी
फ़िक्र की ख़िल्वतों में आऊँगी
ग़म के साये में गुनगुनाउँगी
नज़्म की रूह बन के आऊँगी
गीत की लय में समाऊँगी 


इक नए देस को सिधारे हो
तुम जहां भी रहो हमारे हो.…

Sunday, February 22, 2015

हम बेखुदी में तुझ ही से प्यार करते रहे....

वो दिन जब कोई वजहे- इंतज़ार न थी
हम उनमें भी तेरा इंतज़ार करते रहे
रंग बदले किसी सूरत इस तन्हाई का
हम खिज़ा में भी तलाश बहार करते रहे

सुन तो ले, देख तो ले, मान भी ले 'मीना'
हम बेखुदी में तुझ ही से प्यार करते रहे....

Thursday, February 12, 2015

क्या डराती हैं हवाएँ मुझे अंजाम से...

मैं तो मिट्टी का बदन ओढ़ के खुद निकली हूँ
क्या डराती हैं हवाएँ मुझे अंजाम से...!!!


अपने चेहरे पे न औरों के ख़्याल सजा 'मीना'
रूप आता है कहीं किसी के दिए नाम से...!!!

और यूँ हर शाम की होती है मुश्क़िल से सहर ...

गूँजती हैं मन के वीराने में क्या क्या आहटें
और यूँ हर शाम की होती है मुश्क़िल से सहर

उदास रात के आँगन में रात की रानी
महक उठती है तुझे सोचकर यूँही अक़्सर

कल भी बुझ जाते थे,  जल उठते थे यादों के दिए
आज तो जी की लगी करने नहीं देती है सबर

कि एक रेल की सीटी ख़ामोश मद्धम सी
सुना जाती है कि लम्बा है सितारों का सफर

दिल अपना खोल के 'मीना' रखें किस के आगे
यहाँ कोई दोस्त न हमदम न है कोई हमसफ़र

Monday, February 9, 2015

तसवीरें कहाँ बोलती हैं ....

तसवीरें कहाँ बोलती हैं 
बस मेज़ के किसी कोने पे 
बैठी गुज़रे ज़माने  के राज़ खोलती हैं 
बहुत कोशिश की है  
मैंने इनसे बात करने की 
पर ये वक़्त की क़ैद में लिपटी 
किसी के न होने का एहसास ज़िंदा करा जाती हैं 
तसवीरें कहाँ कुछ बोलती हैं  

Saturday, February 7, 2015

समझें किसे अपना, है पराया कौन

समझें किसे अपना, है पराया कौन
चेहरे पे कई चेहरे लगाए हुए हैं लोग


बढ़ा तो लें हाथ दोस्ती के मगर 'मीना'
हाथों से अपने ज़ख्म दबाए हुए हैं लोग

Friday, February 6, 2015

यादें लफ़्ज़ों में उतरती रहीं...

हसीं खामोशियों के सायों में
वस्ल की रातें ढलती रहीं...

सूने सफ़ेद कागज़ों पे रह रह कर
यादें लफ़्ज़ों में उतरती रहीं...

Monday, February 2, 2015

तुम पास में हो, पर है, इक फ़ासिला बकाया

तुम कब मिलोगे मुझको कब दूरियाँ घटेंगी 
तुम पास में हो, पर है, इक फ़ासिला बकाया 

इस तरह से न करना बातों को ख़त्म अपनी 
रह जाने भी दो 'मीना' इक सिलसिला बक़ाया 

Saturday, January 3, 2015

कोई भी तो दरमियाँ नहीं होता

दिल यूँ ही बेज़ुबाँ नहीं होता
ग़म, ज़ुबाँ से बयाँ नहीं होता


आग जलती है रात दिन दिल में
लेकिन इसका धुआँ नहीं होता


आसान है करना बातें वफ़ा की
पूरा ये सबसे इम्तिहाँ नहीं होता


चाँद सूरज सियाह लगते हैं
ग़म का साया कहाँ नहीं होता


सभी को होती है रौशनी हासिल
बस एक मुक़म्मल जहाँ नहीं होता


अश्क़ों की नगरी में देखा है अक्सर
खुशियों का कारवाँ नहीं होता


तेरी यादों से जब लिपटती है 'मीना'
कोई भी तो दरमियाँ नहीं होता