Sunday, May 15, 2016

बिछड़ के तुमसे मैं बर्फ की तरह जम गयी हूँ
पिघल के तुम तक पहुँच सकूँ इतनी धूप दे दो...
सुनो,
तुम और मैं हर वक़्त झगड़ते हैं
अपने-अपने सच को साबित करने के लिए
कितना चिल्लाते हैं
कई कई दिनों तक
एक दुसरे से रूठ जाते हैं
और फिर दूसरा मना ले
इसकी दुआ भी मनाते हैं

ये सिर्फ तुम से
सिर्फ एक तुम जिसके साथ मैं बच्ची सी बन जाती हूँ
मेरी हर बात तुमसे मनवाती हूँ
मेरी तल्ख बातें भी नज़र अंदाज़ करवाती हूँ
बेसुरे से गीत सुनाती हूँ
और अगर तुम वाह न करो तो मुंह फुलाती हूँ
ये सिर्फ तुम् से.....
लेकिन...
कल जब
जान बूझकर मैंने कप को नीचे फेंका
बेसबब ही तुम्हारी शर्ट को जलाया
बैठे बैठे खुद पे पानी गिराया
तो तुम
ख़फ़ा क्यों नहीं हुए
क्यों बिगड़े नहीं मुझसे
बात क्या है, क्यों झगड़ नहीं पाये तुम
सुनो,
टेढ़ी टेढ़ी नज़रों से घूर कर
जुदा हो जाओ ना
चंद लम्हों के लिए ही सही
ख़फ़ा हो जाओ ना
फिर छेड़ दिया किसने एहसास के तारों को
फिर दर्द के उठते हैं नग़मात मेरे दिल में...
हवा का हमसफ़र होना
हवा हो कर ही मुमकिन है .....
अभी गया है कोई मगर यूँ लगता है
जैसे सदियाँ बीतीं घर ख़ामोश हुए...
रात भर भीगी हूँ 'मीना' मैं भी किसके नूर में
आसमाँ से चाँदनी बरसाता अब ये कौन है.…
पानी पानी रे...
यही होता है
भाग्य हर धरती का
कि
एक आकाश
उसे सर पर उठाये
रखना होता है
छत के भ्रम में
और
मुंह बाये
देखते रहना होता है
उसकी तरफ
कि मेरा जल
मुझको लौटा दे
प्यासी हूँ
पानी पिला दे...
शाख़ से टूटे पत्ते को
मौज की मर्ज़ी बहने दो
दुनियादारी रहने दो...
चल हाशियों पे मिलते हैं... ज़िन्दगी के पन्नों पे अपनी जगह नहीं
मैंने खोया है खुद को मुश्क़िल से
या खुदा ढूँढ ना लाये कोई...
सांस रुकती है तो अक्सर ये गुमां होता है
कोई तो मेरे इलावा भी यहाँ रहता है.....
इस छत से आसमान तक
तेरा ही तो ख़याल है.....
लिखती हूँ जो, मिटा देते हैं आँसू लेकिन
हर वरक़ पे नज़र आते हैं दाग़ दिल के...
आ...तुझे ढूँढती हैं नज़रें उसी रस्ते पर
कब तलक़ गाल को कोहनी पे टिकाए रखें...
---मीना (निज़ाम जी के एक मिसरे से प्रेरित)
तुझसे जुदा होकर मैं जाऊँ तो कहाँ
तू है, ख़ुदा है, और बस कुछ भी नहीं...
होती हैं ला-ज़वाल मुहब्बत की बारिशें
चाहत की, इनायत की, ये उल्फत की बारिशें...
दीवारों से भी मेरी कब निभती है
आप ही कहती हूँ आप सुना करती हूँ ....
किसी शायर किसी फ़नकार से तुम राबता रखना
तुम अपने ज़हन में इक फ़िक्र-ए-रौशन को सदा रखना

न जाने कौन कितनी प्यास में किस वक़्त आ जाए
निगाहों में बहर लम्हा कोई दरिया बसा रखना

अँधेरे फिर बढ़ेंगे रौशनी तब और माँगेंगे
दिए तुम हौसलों के दम-ब-दम दिल में जला रखना

हमेशा मुश्किलों के वक़्त तेरे काम आएँगी
बुज़ुर्गों की दुआओ को बचा रखना बचा रखना

मुहब्बत ज़ख़्म खाते रहने ही का नाम है 'मीना'
मेरी मानो मुहब्बत से मुहब्बत तुम बना रखना...