जिसे हम चाहें वो शक़्स खुदा नहीं होता
हर लाल रंग खून का क़तरा नहीं होता
रात तो आती है, बस सवेरा नहीं होता
क्यों पूछते हैं मेरा हाल मेरे अपने ही सब
ख़ुशी का जब मेरे घर में बसेरा नहीं होता
भूल आयें हैं हम अपने आप को भी कहीं
ढूंढ़ते हैं उस दर पे जहाँ अब डेरा नहीं होता
इन्तेहा भी होगी इस इम्तिहाँ की 'मीना'
वक़्त मुसलसल कहीं पे ठहरा नहीं होता
khushi ka jab mere ghar mein baseraa nahin hota
bhool aaye hain hum apne aap ko bhi kahin