Tuesday, September 29, 2015

तू भीग ले...

बादल उठे हैं यहाँ बारिश लगी है आज फिर
तू भीग ले संग मेरे आ कर ज़रा ऐ ज़िन्दगी

फिर छेड़ दिया किसने एहसास के तारों को...

छुपने लगी है मुझसे क्या बात मेरे दिल में
इक दर्द-सा उठता है हर रात मेरे दिल में

एहसास की गर्मी से तपता है बदन मेरा
शायद अभी बाक़ी हैं जज़्बात मेरे दिल में

हर शाम उमड़ते हैं यादों के घने बादल
हर रात सुलगती है बरसात मेरे दिल में

फिर छेड़ दिया किसने एहसास के तारों को
फिर दर्द के उठते हैं नग़मात मेरे दिल में

छा जाती है रातों में जब शहर पे ख़ामोशी
तब जागते हैं कितने लम्हात मेरे दिल में

Wednesday, September 23, 2015

सिलसिला-ऐ-अश्क़ हूँ

सिलसिला-ऐ-अश्क़ हूँ बह कर बयाँ हो जाऊँगी
देखते ही देखते मैं दास्ताँ हो जाऊँगी

ये सही है मैं बहुत तनहा रही हूँ उम्र भर
एक दिन तुम देखना मैं कारवाँ हो जाऊँगी
कर सितम जितना मगर ये जान ले बेहरूपीए
वक़्त आएगा कि मैं सच की ज़ुबाँ हो जाऊँगी

जानती हूँ बोलने पे है कड़ी पहरेदारी 
चुप्पियाँ पाले रही जल कर धुआँ हो जाऊँगी

जिन दिलों में हौसला हो आसमाँ छूने का अब
उन परों के वास्ते मैं आशियाँ हो जाऊँगी