Monday, June 29, 2015

यूँ हमारे दरमियाँ

यूँ हमारे दरमियाँ तो फासला 'मीना' ना था
एक शहर था ख्वाब का जो बस्ते-बस्ते रह गया...!!!

बस एक ही गुज़ारिश है

बस एक ही गुज़ारिश है कि ज़रा वक़्त ठहर जाए
बहुत रौनक है उनके आने से शहर में 'मीना' …!!!

देहलीज़ पे जा बैठी है मेरी ख्वाइश…

पलकों पे मुस्कान झुकी-झुकी सी
कुछ कहने को बेचैन लेकिन चुप
दांतों में उमंग का आँचल दबाये
देहलीज़ पे जा बैठी है मेरी ख्वाइश…

कई लम्हे

कई लम्हे
बरसात की बूँदें हैं
जो पकडे नहीं जा सकते
दिल पर आकर लगते हैं
और हाथ बढ़ा
कि इससे पहले
फिसल कर टूट जाते हैं

यूँ लगता है

अभी गया है कोई मगर यूँ लगता है
जैसे सदियाँ बीतीं घर ख़ामोश हुए...

वो आँखें करती थीं मुझसे अनकही बातें

वो आँखें करती थीं मुझसे अनकही बातें 
उनके लिए फिर से सँवरना पड़ा मुझे
फिर ज़िन्दगी ने देख पुकारा है दूर सेइक और रात खुद में ठहरना पड़ा मुझे
---मीना---

Wednesday, June 17, 2015

हमने आँखों में बरसता हुआ सावन देखा...

किसकी यादों की घटा टूट के बरसी दिल पे 
हमने आँखों में बरसता हुआ सावन देखा.... 

मुझे जाने की इज़ाज़त दे दो...

मुझे जाने की इज़ाज़त दे दो
अश्क़ों को मुझे तुम पीने दो 
 
अपने दिल से यूँ विदा करो 
तुम मुझको खुद से रिहा करो
आँखों के आँसू सब देखें 
कोई दिल की दरारें देखे न 
ख़ामोशी के लब सीने दो 
और गुमनामी में बहने दो
यादें हमारी तुम अता करो
तुम मुझको खुद से रिहा करो
कोई झूट ही आकर कह देता 
ये दर्द हमारे सब झूठे हैं 
इन तल्ख़ समाजों को रहने दो
गहरे ज़ख्मों को सहने दो
हमें चैन मिले ये दुआ करो
तुम मुझको खुद से रिहा करो
----मीना----

Sunday, June 7, 2015

बुझ गयी जो लौ...

मैं तो सो लुंगी अंधेरों में मगर 'मीना'
बुझ गयी जो लौ तो देवता मर जाएंगे...!!!

फिर इसके बाद जो बचता है वो कहानी है.....

मैं और मेरी तरह तू भी इक हकीकत है
फिर इसके बाद जो बचता है वो कहानी है.....
---मीना---

मुंबई में बारिश की पहली बूँदें...

ये कमरे का मंद उजाला बाहर हूक पपीहे की
खिड़की पे बूंदों की दस्तक साँसें भरती ख़ामोशी...


--मीना-- (मुंबई में बारिश की पहली बूँदें, ०७ जून २०१५)

Wednesday, June 3, 2015

ये किन हदों से होकर गुज़रना पड़ा मुझे...

ये किन हदों से होके गुज़रना पड़ा मुझे
खुद को समेटने में बिखरना पड़ा मुझे


तुझ में हो गयी थी मैं इस क़दर शामिल
तेरे लिए ही तुझसे बिछड़ना पड़ा मुझे

होते हैं कहाँ पूरे ख़्वाबों के सिलसिले
हर इक मोड़ पे हर बार ठहरना पड़ा मुझे


शादाब होने लगते हैं जब आती है बहार
ज़ख्मों भरी बहार से डरना पड़ा मुझे


ज़रूरी नहीं कि तू हो तो हो ज़िन्दगी
तेरे बिना भी 'मीना' चलना पड़ा मुझे ......