Monday, May 8, 2017

सच तो ये है की गुमाँ हूँ मैं भी
तू नहीं है तो कहाँ हूँ मैं भी....
टूटता बनता बिगड़ता ही रहा वो उम्र भर
ख्वाब अदना सा मेरा था भीड़ में ही खो गया...
क्या शै है जहाँ निशाँ नहीं है
कैसे कहूँ दूँ तू यहाँ नहीं है...!!!
साया है तेरी मौहब्बतों का
सर पर मेरे आसमाँ नहीं है...!!!
नमालूम...
किसे पता कि कहाँ कौन कब बिछुड़ जाए
वो बात कर जो मेरी ज़िन्दगी से जुड़ जाए...
जो देखा हाल मेरा अपना हाल भूल गया
जवाब माँगने वाला सवाल भूल गया...
कभी मुझे ऐसा महसूस होता है
कि वो मेरी पीठ पर
अपनी उँगलियों से 
बुन रहा है कोई कहानी 
और 
तब मुझमें
गुनगुनाने लगता है
एक गीत
बहकने लगती है ख़ामोशी
जैसे तमाम कायनात
नशे में हो ....
वो दिन भी आने वाला है
जब मेरी इन भूरी आँखों में हर जज़्बा मिट जाएगा
मेरे बाल जो
सावन की घनघोर घटाओं से लहराते हैं 
उनपर भी पतझड़ की रुत छा जायेगी
और
किसी अकेली सी रात की चुप में
गए दिनों की याद आएगी...
जैसे
कोई किसी बस्ती में गीत पुराने गाता है...
जैसे
कोई मुझ को पास अपने बुलाता है....
जैसे
कोई फिर से चॉकलेट खिलाता है...