Tuesday, September 29, 2015

फिर छेड़ दिया किसने एहसास के तारों को...

छुपने लगी है मुझसे क्या बात मेरे दिल में
इक दर्द-सा उठता है हर रात मेरे दिल में

एहसास की गर्मी से तपता है बदन मेरा
शायद अभी बाक़ी हैं जज़्बात मेरे दिल में

हर शाम उमड़ते हैं यादों के घने बादल
हर रात सुलगती है बरसात मेरे दिल में

फिर छेड़ दिया किसने एहसास के तारों को
फिर दर्द के उठते हैं नग़मात मेरे दिल में

छा जाती है रातों में जब शहर पे ख़ामोशी
तब जागते हैं कितने लम्हात मेरे दिल में

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