Wednesday, June 3, 2015

ये किन हदों से होकर गुज़रना पड़ा मुझे...

ये किन हदों से होके गुज़रना पड़ा मुझे
खुद को समेटने में बिखरना पड़ा मुझे


तुझ में हो गयी थी मैं इस क़दर शामिल
तेरे लिए ही तुझसे बिछड़ना पड़ा मुझे

होते हैं कहाँ पूरे ख़्वाबों के सिलसिले
हर इक मोड़ पे हर बार ठहरना पड़ा मुझे


शादाब होने लगते हैं जब आती है बहार
ज़ख्मों भरी बहार से डरना पड़ा मुझे


ज़रूरी नहीं कि तू हो तो हो ज़िन्दगी
तेरे बिना भी 'मीना' चलना पड़ा मुझे ......

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