Thursday, July 16, 2015

मेरे अंदर यह कौन है जो मुझसे ख़फ़ा है ?

मेरे अंदर यह कौन है  
जो मुझसे ख़फ़ा है ?
कभी दिल की तहों में 
पड़ा चीखता है 
कभी बहती रगों में 
सरासर दौड़ता है 
कभी आँखों की
शर्म में डूबता है 
कभी कानों में आकर 
चुपके से कहता है.…
तू अब तलक यहाँ है 
इक शहर उदास वहाँ है
एक आग है लगी हुई 
प्यास कहाँ बुझी हुई 
लाखों जंगल काटे हैं 
भयानक सन्नाटे हैं 
खौफ है मचा हुआ
इन्सानियत धुआँ धुआँ
तू अब तलक है जी रहा 
ख़्वाबों के घूँट पी रहा 
तू अब तलक यहाँ है 
इक शहर उदास वहाँ है


मेरे अंदर यह कौन है
जो मुझसे ख़फ़ा है ? 

---मीना, जुलाई २०१५---

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