Tuesday, November 17, 2015

कहीं शबनम, कहीं खुशबू, कहीं ताज़ा कली रखना
पुराने पन्नों में तुम खूबसूरत ज़िन्दगी रखना
यहाँ पर आँधियों का आना जाना रोज़ रहता है
ज़रा तुम खुद ही खुद में अब जलाये रौशनी रखना
भरम रह जाएगा देखो कहीं आँसू कहीं ग़म का
सदा चहरे पे तुम अपने बनाये इक हँसी रखना
हैं गहरे ज़ख्म 'मीना' खाये अपनों से, परायों से
कहीं पर आग रख देना, कहीं पर चाँदनी रखना 

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