पानी पानी रे...
यही होता है
भाग्य हर धरती का
कि
एक आकाश
उसे सर पर उठाये
रखना होता है
छत के भ्रम में
और
मुंह बाये
देखते रहना होता है
उसकी तरफ
कि मेरा जल
मुझको लौटा दे
प्यासी हूँ
पानी पिला दे...
यही होता है
भाग्य हर धरती का
कि
एक आकाश
उसे सर पर उठाये
रखना होता है
छत के भ्रम में
और
मुंह बाये
देखते रहना होता है
उसकी तरफ
कि मेरा जल
मुझको लौटा दे
प्यासी हूँ
पानी पिला दे...
No comments:
Post a Comment