Sunday, May 15, 2016

किसी शायर किसी फ़नकार से तुम राबता रखना
तुम अपने ज़हन में इक फ़िक्र-ए-रौशन को सदा रखना

न जाने कौन कितनी प्यास में किस वक़्त आ जाए
निगाहों में बहर लम्हा कोई दरिया बसा रखना

अँधेरे फिर बढ़ेंगे रौशनी तब और माँगेंगे
दिए तुम हौसलों के दम-ब-दम दिल में जला रखना

हमेशा मुश्किलों के वक़्त तेरे काम आएँगी
बुज़ुर्गों की दुआओ को बचा रखना बचा रखना

मुहब्बत ज़ख़्म खाते रहने ही का नाम है 'मीना'
मेरी मानो मुहब्बत से मुहब्बत तुम बना रखना...

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