Sunday, May 31, 2015

अब वक़्त का मुड़ना भी गवारा नहीं होगा...

मौसम के बदलते ही बदल जाती हैं आँखें
आ देख कि फिर ऐसा नज़ारा नहीं होगा


ये ख्वाब भी ताबीर के उस मोड़ पे खोये
डूबेंगे जहाँ हम तो सहारा नहीं होगा


देखो ये भटकते हुवे रस्ता मुझे पूछे
मंजिल ने इन्हें यार पुकारा नहीं होगा


इस शहर की खामोशी किसी तर'ह तो टूटे
कोई तो हो जो दर्द का मारा नहीं होगा


ये जीस्त तो 'मीना' है तिलिस्मी के नगर सी
अब वक़्त का मुड़ना भी गवारा नहीं होगा

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