Monday, October 12, 2015

अभी हम हैं...

जो रिश्ते हैं हकीकत में वो अब रिश्ते न नाते हैं
हमें जो लगते हैं अपने उन्ही से चोट खाते हैं

कभी लोगों के ताने हैं कभी घर की परेशानी
मुसीबत साथ है उसके उसे तनहा ही पाते हैं

नई मंज़िल बनानी है नये रस्ते बसाएँगे
सितम की उम्र छोटी है ज़रा उसको बताते हैं

कि महनत की कलम से ही जो लिखते हैं क़िताबों को
कभी उनके मुक़द्दर के सफे रँग ले ही आते हैं

हमारे ही बनाने से बने हैं ये सभी झगडे
किसी मज़हब की साज़िश में कभी बच्चों को पाते हैं ? 

अभी हम हैं हमारे बाद भी होंगी यही बातें
चलो हम तुम ज़माने में मुहब्बत छोड़ जाते हैं 

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