Tuesday, March 22, 2016

वो मेरा अपना चेहरा है....

वो चाहती है कि 
कोई कहीं पे 
दिल लगाए नहीं 
वो चाहती है कि 
ग़म के अँधेरे 
कोई बुझाए नहीं 
वो चाहती है कि 
नदी किनारे 
कोई गीत गाये नहीं....  

मैं चाहती हूँ कि 
दिलों को कोई रोके नहीं 
इश्क़ की पींगें बढ़ाने से 
मैं चाहती हूँ कि 
जुगनू को कोई रोके नहीं 
दिया जलाने से 
मैं चाहती हूँ कि 
कोयल को कोई रोके नहीं 
ग़ज़ल सुनाने से....  

हमारी सूरतें दो हैं मगर 
हैं एक ही हम 
उस आईने में जो 
दोनों की एक दुनिया है 
मैं उसका अक्स हूँ 
वो मेरा अपना चेहरा है....  

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