तसवीरें कहाँ बोलती हैं
बस मेज़ के किसी कोने पे
बैठी गुज़रे ज़माने के राज़ खोलती हैं
बहुत कोशिश की है
मैंने इनसे बात करने की
पर ये वक़्त की क़ैद में लिपटी
किसी के न होने का एहसास ज़िंदा करा जाती हैं
तसवीरें कहाँ कुछ बोलती हैं
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