गूँजती हैं मन के वीराने में क्या क्या आहटें
और यूँ हर शाम की होती है मुश्क़िल से सहर
उदास रात के आँगन में रात की रानी
महक उठती है तुझे सोचकर यूँही अक़्सर
कल भी बुझ जाते थे, जल उठते थे यादों के दिए
आज तो जी की लगी करने नहीं देती है सबर
कि एक रेल की सीटी ख़ामोश मद्धम सी
सुना जाती है कि लम्बा है सितारों का सफर
दिल अपना खोल के 'मीना' रखें किस के आगे
यहाँ कोई दोस्त न हमदम न है कोई हमसफ़र
और यूँ हर शाम की होती है मुश्क़िल से सहर
उदास रात के आँगन में रात की रानी
महक उठती है तुझे सोचकर यूँही अक़्सर
कल भी बुझ जाते थे, जल उठते थे यादों के दिए
आज तो जी की लगी करने नहीं देती है सबर
कि एक रेल की सीटी ख़ामोश मद्धम सी
सुना जाती है कि लम्बा है सितारों का सफर
दिल अपना खोल के 'मीना' रखें किस के आगे
यहाँ कोई दोस्त न हमदम न है कोई हमसफ़र
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