Sunday, July 13, 2014

एक रोज़ उसे चले ही जाना था

उसे
बेवफ़ा होना ही था
मुझसे
सिलसिला तोडना ही था
कोई रिश्ता रखना ही न था
दो कदम साथ चलना भी न था
एक रोज़ उसे चले ही जाना था
एक रोज़ मुझे संभल ही जाना था
वफ़ा की राह में वो
चल न पायेगा, मुझे यक़ीन था
बाद इसके भी मगर
हरेक लम्हा उसके साथ का
बहुत हसीं था !
मैं जानती हूँ
उसे कहाँ ठहरना था
वो तो बादल था और मैं सहरा
मगर
वो फिर भी मेरा हुआ था
एक पल के ही लिए सही
उसने मेरे दिल की गहराई को छुआ था  
यही तसल्ली है
यही भरम है
मैं यही सोचती हूँ
'एक रोज़ उसे चले ही जाना था
एक रोज़ मुझे संभल ही जाना था...'

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