ग़म-ऐ-दौरान का पहर है और हम है दोस्तों
होने को बस सहर है और हम हैं दोस्तों
लाई हैं संग उदासियाँ घटाएँ इस बार
बरखा की रुत का कहर है और हम हैं दोस्तों होने को बस सहर है और हम हैं दोस्तों
लाई हैं संग उदासियाँ घटाएँ इस बार
यह अजनबी सी मंज़िलें और बीते दिनों की याद
तन्हाइयों का ज़ेहर है और हम हैं दोस्तों
---मीना, जुलाई १७, २०१४
आँखों में उड़ रही हैं लुटी महफ़िलों की धूल
आवारगी की लहर है और हम हैं दोस्तों
No comments:
Post a Comment