Monday, August 10, 2015

माँ ...

माँ
अब बहुत कुछ
बदल गया है…
अब नही सुनाई देती 
वो घंटी की टन-टन
जो तुम घँटों बजाती थीं
दीवार पे टंगी तस्वीरों पे
ना ही बजता है फ़ोन
रोज़-रोज़ ये पूछने के लिए
कि मैंने खा लिया है की नहीं
और न ही मिलती है खबर
पास-पडोसी की
सिमट सी गयी है
दुनिया अब माँ
मेरे घर का नौकर भी
मेरी झिड़की नहीं सुनता
तू तो हर बार मेरी डाँट
सुनी-अनसुनी कर देती थी
उस बूढ़े मकान में
मेरे बचपन और
जलेबी-कचोरी के दिन भी
अब नहीं रहे
रह गयीं हैं तो बस
कुछ तसवीरें
फीके हुए से खत
और नुक्कड़ पे
वो साड़ी की दूकान
जिसे तू ललचती
आँखों से देखा करती थीं
माँ
अब बहुत कुछ
बदल गया है…
(शायद मैं बरसों लिख सकती थी …
अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो… अभी तो एहसास जी रहा है)

No comments:

Post a Comment