गूँजती हैं मन के वीराने में क्या क्या आहटें
और यूँ हर शाम की होती है मुश्क़िल से सहर...
और यूँ हर शाम की होती है मुश्क़िल से सहर...
कल भी बुझ जाते थे, जल उठते थे यादों के दिए
आज तो जी की लगी करने नहीं देती सबर...
आज तो जी की लगी करने नहीं देती सबर...
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