वो दिन भी आने वाला है
जब मेरी इन भूरी आँखों में हर जज़्बा मिट जाएगा
जब मेरी इन भूरी आँखों में हर जज़्बा मिट जाएगा
मेरे बाल जो
सावन की घनघोर घटाओं से लहराते हैं
उनपर भी पतझड़ की रुत छा जायेगी
सावन की घनघोर घटाओं से लहराते हैं
उनपर भी पतझड़ की रुत छा जायेगी
और
किसी अकेली सी रात की चुप में
गए दिनों की याद आएगी...
जैसे
कोई किसी बस्ती में गीत पुराने गाता है...
जैसे
कोई मुझ को पास अपने बुलाता है....
जैसे
कोई फिर से चॉकलेट खिलाता है...
किसी अकेली सी रात की चुप में
गए दिनों की याद आएगी...
जैसे
कोई किसी बस्ती में गीत पुराने गाता है...
जैसे
कोई मुझ को पास अपने बुलाता है....
जैसे
कोई फिर से चॉकलेट खिलाता है...
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