क्या कहूँ किसीसे क्यों उदास हो जाती हूँ
मैं कभी-कभी खुद से ही रूठ जाती हूँ
मैं कभी-कभी खुद से ही रूठ जाती हूँ
जाने कहाँ भूल आई हूँ अपनी पहचान
सोचती हूँ तो खुद को अजनबी सा पाती हूँ
ज़िन्दगी तू मेरी हैरानी देखती है क्या
चल तुझे भी आज आइना दिखलाती हूँ
रात हो चुकी क़ाफी चलो अब तो सो जाएँ
मुझमें कौन जागा है, मैं किसे सुलाती हूँ
मुझमें कौन जागा है, मैं किसे सुलाती हूँ
जल रही हूँ सदियों से अपनी ही आग में 'मीना'
समझ रहे हैं लोग कि रास्ता दिखाती हूँ
kya kahun kisi se kyun udaas ho jaati hun
main kabhi-kabhi khud se hi rooth jaati hunkya kahun kisi se kyun udaas ho jaati hun
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