भटकती हूँ, नज़र आता नहीं किनारा मुझ को
ये किसकी याद आई है दोबारा मुझ को
ये किसकी याद आई है दोबारा मुझ को
दश्तो-दर में गूँजती है इक आवाज़
ये किस ने सर-ऐ-आम पुकारा मुझ को
अब जो आये तो समेट ले आ कर
करती हैं ये हवाएँ आवारा मुझ को
उसके आने से है बदली हर शकल
ये किसकी नज़र ने है सँवारा मुझ को
खुद को अब पहचानती ही नहीं 'मीना'
ये अपने रंग में किसने है उतारा मुझ को
ये अपने रंग में किसने है उतारा मुझ को
Bhatakti hun, nazar aata nahin kinaara mujh ko
ye kiski yaad aayee hai dobaara mujh ko
dasht-o-dar mein gunjti hai ik awaaz
ye kis ne sar-e-aam pukaara mujh ko
ye kis ne sar-e-aam pukaara mujh ko
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