लौट आयी मैं बिना कुछ कहे
लफ्ज़ कम पड़ने लगे
दर्द बढ़ने लगा
थकी हुई आँखों से फिर भी पानी बहे
फासले बढ़ते गए
घर दूर होता रहा
साथ चलकर भी ये रास्ते अजनबी से रहे
बिखरती मैं गयी जितना
तुम सिमटते गए उतना
दर्द मैंने तुमने हमने कुछ ज़यादा ही सहे
और वो लफ्ज़ जिन्हें
रेत पे लिखती रही
आहिस्ता आहिस्ता मिटते रहे
लौट आयी मैं बिना कुछ कहे
लफ्ज़ कम पड़ने लगे
दर्द बढ़ने लगा
थकी हुई आँखों से फिर भी पानी बहे
फासले बढ़ते गए
घर दूर होता रहा
साथ चलकर भी ये रास्ते अजनबी से रहे
बिखरती मैं गयी जितना
तुम सिमटते गए उतना
दर्द मैंने तुमने हमने कुछ ज़यादा ही सहे
और वो लफ्ज़ जिन्हें
रेत पे लिखती रही
आहिस्ता आहिस्ता मिटते रहे
लौट आयी मैं बिना कुछ कहे
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