एक पुरानी ग़ज़ल जिसे बहर में लिखने की कोशिश ...
दिल यूँ ही बेज़ुबाँ नहीं होता
ग़म ज़ुबाँ से बयाँ नहीं होता
ग़म ज़ुबाँ से बयाँ नहीं होता
आग जलती है रात दिन दिल में
फिर भी इसका धुआँ नहीं होता
फिर भी इसका धुआँ नहीं होता
अश्क के इस नगर में खुशियों का
दूर तक कारवाँ नहीँ होता
दूर तक कारवाँ नहीँ होता
चाँद सूरज सियाह लगते हैं
ग़म का साया कहाँ नहीं होता
ग़म का साया कहाँ नहीं होता
सब को होती है रौशनी हासिल
बस मुक़म्मल जहाँ नहीं होता
बस मुक़म्मल जहाँ नहीं होता
तेरी यादों से जब लिपटती हूँ
कोइ भी दरमियाँ नहीं होता...
कोइ भी दरमियाँ नहीं होता...
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