तुम कहते हो मैं - इक महिला - सिर्फ आज के दिन ख़ास हूँ... बाक़ी के 364 दिनों का क्या होगा?
मेरे वजूद को एक दिन में क़ैद करने की कोशिश न करें
मैं भी इंसान ही हूँ... मेरे अंदर भी वही धड़कन है जो तुम्हारे अंदर धड़कती है, खून का रंग भी वही है, मुझे किसी मज़हब, जाती, योनि, रिश्तों में न बाँधो - मैं किसी एक दिन की खुशियों या दुआओं की मोहताज नहीं... मैं 365 दिन, हर पल मरती हूँ, जीती हूँ, खुशियाँ मनाती हूँ, रोती-बिलखती हूँ, हर वो एहसास में रहती हूँ जिसमे से होकर तुम भी गुज़रते हो... तो चलो - हम इंसानियत का दिन मनाते हैं, रिश्तों को निभाते हैं, हर किसी को गले लगाते हैं, दिलों से वहशत को हटाते हैं, ये तुम और मैं में बटी हुई दुनिया को हमारी दुनिया बनाते हैं, चलो हम तुम ज़माने में मुहब्बत छोड़ जाते हैं...
मैं भी इंसान ही हूँ... मेरे अंदर भी वही धड़कन है जो तुम्हारे अंदर धड़कती है, खून का रंग भी वही है, मुझे किसी मज़हब, जाती, योनि, रिश्तों में न बाँधो - मैं किसी एक दिन की खुशियों या दुआओं की मोहताज नहीं... मैं 365 दिन, हर पल मरती हूँ, जीती हूँ, खुशियाँ मनाती हूँ, रोती-बिलखती हूँ, हर वो एहसास में रहती हूँ जिसमे से होकर तुम भी गुज़रते हो... तो चलो - हम इंसानियत का दिन मनाते हैं, रिश्तों को निभाते हैं, हर किसी को गले लगाते हैं, दिलों से वहशत को हटाते हैं, ये तुम और मैं में बटी हुई दुनिया को हमारी दुनिया बनाते हैं, चलो हम तुम ज़माने में मुहब्बत छोड़ जाते हैं...
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